सभी राजनीतिक दलों ने कुड़मियों को ठगा, सुदेश और रामटहल सबसे ज्यादाः शीतल ओहदार (देखें इंटरव्यू)

Publisher NEWSWING DatePublished Thu, 02/01/2018 - 06:54

newswing.com से बात करते हुए कुड़मी विकास मोर्चा के शीतल ओहदार ने कहा सुदेश और रामटहल जैसे राजनेता कुड़मी समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती, रघुवर दास से सीखें

Ranchi : झारखंड में कुड़मी राजनेताओं, विधायकों, सांसदों और मंत्रियों ने समाज के लोगों को ठगने का काम किया है. समाज को एक वोट बैंक की तरह इस्तेामाल किया है, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. झारखंड के टोटेमिक कुड़मियों को आदिवासी में शामिल नहीं किया गया तो उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. यह बात कुड़मी विकास मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष शीतल ओहदार ने newswing.com के संवाददाता Pravin kumar और Subash shekhar के साथ खास बातचीत में कहा.
शीतल ओहदार ने आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो, सांसद रामटहल चौधरी, विद्युत वरण महतो समेत झारखंड के सभी कुड़मी विधायकों पर सीधा प्रहार किया. कहा कि अगर वे सब चाहते तो झारखंड के कुड़मियों की मांग बहुत पहले ही पूरी हो जाती. सुदेश यहां के उप मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन उन्होंने झारखंड के कुड़मियों को एक वोट बैंक की तरह इस्ते‍माल किया.


शीतल ओहदार से बातचीत के महत्वपूर्ण अंशः-

न्यूज विंगः किस आधार पर कुड़मी को आदिवासी दर्जा देने की मांग कर रहे हैं ?
शीतल ओहदार: कुड़मी को आदिवासी का दर्जा देने की मांग झारखंड आंदोलन से भी पुरानी है. झारखंड बनने के बाद उम्मीद थी कि कुड़मियों की यह मांग पूरी होगी. लेकिन झारखंड बनने के बाद भी यह मांग पूरी नहीं हुई. 1931 तक कुड़मी आदिम जनजाति के श्रेणी में थे. 1950 में जब नई सूची बनी तब उस समय हम लोगों को बिना कारण के छोड़ दिया गया. हमलोग सुविधा लेने के लिए लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. यह लड़ाई हमारे संवैधानिक अधिकार के लिए है. 


कुड़मी विकास मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष शीतल ओहदारन्यूज विंगः आजादी के 70 साल बाद आज इस लड़ाई की जरूरत क्यों पड़ी, जबकि झारखंड में कुड़मी समाज काफी सशक्त है ?
शीतल ओहदार : कुड़मी समाज को उन्नत और सशक्त  कहना गलत होगा. आज भी कुड़मी समाज के लोग गांव में पत्ता् और दतवन बेचकर गुजर-बसर कर रहे हैं. जंगलों में उन्हें  कोई देखने पूछने वाला नहीं है. झारखंड गठन के 17 सालों बाद भी कुड़मी समाज के हालात में सुधार नहीं है. हमारे पूर्वज बिनोद बिहारी महतो और निर्मल महतो ने कुड़मियों के विकास के लिए अलग झारखंड का सपना देखा था. आज उल्टा हो रहा है.


न्यूज विंगः क्या कुड़मियों के अधिकार के लिए समाज से चुने गये जन प्रतिनिधि, केंद्र सरकार और राज्य सरकार पर दबाव बना पा रहे हैं ?
शीतल ओहदार : यह हमेशा देखा गया है कि कुड़मी जाति के जो विधायक और सांसद बने और मंत्री और उपमुख्यमंत्री तक बने और पद में थे, तब उन्होंने समाज की चिन्ता नहीं की. जैसे ही वो पद से हट गये तो कोशिश में हैं कि समाज को फिर से अपनी ओर खींचे. अभी तक के जनप्रतिनिधियों ने कभी कोई सार्थक प्रयास ही नहीं किया जिससे कुड़मियों को आदिवासी का दर्जा मिले.


न्यूज विंगः अभी भी झारखंड में दो कुड़मी सांसद रामटहल चौधरी और विद्युत वरण महतो हैं. क्‍या इन्होंने भी कुडमी समाज के लिए आगे बढ़कर सहयोग नहीं  किया ? 
शीतल ओहदार : पूर्व उप मुख्यमंत्री सुदेश महतो समेत यहां के सांसदों और विधायकों ने हमेशा से कुड़मी समाज का इस्तेमाल किया है. हमारे लोग डिप्टी सीएम भी बने. वो चाहते तो कुछ भी कर सकते थे. यह संभव था कि हम काफी पहले एसटी की लिस्ट में आ जाते. यहां दो सांसद होने के बावजूद हमारे समाज की बातों को लोकसभा में रखा नहीं जा रहा है. इसके लिए हमें ओड़िशा जैसे दूसरे राज्यों के कुड़मी सांसदों की मदद लेनी पड़ रही है. 


न्यूज विंगः भाजपा के कुड़मी विधायकों का सहयोग मिल रहा है ?
शीतल ओहदार : सभी लोग अपने समाज से उपर अपनी पार्टी और राजनीति को समझते हैं. सत्ता और विधायकी को बचाने के लिए समाज की बैठक में आते हैं. वो सदन और सीएम के सामने दबाव बनाने में असफल हैं. 


न्यूज विंगः पिछले लोकसभा चुनाव में आजसू को कुड़मियों की पार्टी के रूप में स्थापित करने की मुहिम चली थी. क्या उसी तरह आप भी समाज के मुद्दे राजनीतिक गलियारों में इस्तेमाल किए जाएंगे या आपकी कोई ठोस रणनीति है?
शीतल ओहदार : वह एक राजनीतिक रणनीति थी. उससे समाज को कोई फायदा नहीं मिलता. न मिला. अब जो हमारी रणनीति बन रही है, उससे अब किसी भी नेता या पार्टी को हम अपने कुड़मी समाज को वोट बैंक बनाने नहीं देंगे.


कुड़मी विकास मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष शीतल ओहदारन्यूज विंगः कुड़मी समाज झारखंड में कितना महत्वपूर्ण है ? यह समाज सत्ता को कितना प्रभावित कर सकता है ?
शीतल ओहदार : पूरे राज्य में रांची, गिरिडीह, धनबाद, हजारीबाग और जमशेदपुर कुल पांच लोकसभा क्षेत्र में कुड़मी वोटर ज्यादा हैं. पूरे राज्य में 22 विधानसभा सीटें हैं, जो अनारक्षित हैं. तीन एससी और 6 एसटी सीट हैं, जहां कुड़मी समाज की तादात ज्यादा है.  इन विधानसभा क्षेत्रों में हम लोग एक सीट पर भी भाजपा और भाजपा सरकार को समर्थन करने वाली पार्टी के उम्मीदवारों को जीतने नहीं देंगे. इसके लिए सभी दलों को अल्टीमेटम दिया गया है कि एक महीने के अंदर अपना रुख स्पष्ट करें. 


न्यूज विंगः तेली समाज को लेकर भी राजनीति हो रही है. वो भी आदिवासी सूची में आना चाहते हैं. सीएम भी उन्हे आश्वासन देते नजर आ रहे हैं ?
शीतल ओहदार : सीएम अपने समाज के लिए बढ़-चढ़कर काम कर रहे हैं. उससे हमे कोई परेशानी नहीं है. लेकिन हमारे समाज के जो नेता और विधायक हैं, उनको सीएम रघुवर दास से सीख लेनी चाहिए. कि वह एक सीएम होते हुए अपने समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं. आप जब पावर में आते हैं और डिप्टी सीएम बनते हैं, सांसद और विधायक बनते हैं, तो आप समाज के प्रति अपना दायित्व भूल जाते हैं.  


न्यूज विंगः समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या  है ?
शीतल ओहदार : हमारे नेता ही हमारे समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गये हैं. उनके ही कारण हमारे सामने कुड़मी के नेताओं को एकजुट करना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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