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छोटे पिंजरों वाले मुर्गी फार्म के अंडे और मीट सेहत के लिये खतरनाक : रिपोर्ट

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New Delhi, 24 September : केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट से पता चला है कि छोटे पिंजरों वाले मुर्गी के अंडे और मीट सेहत के लिए हानिकारक हैं. यह आपको बीमार करने के लिए काफी है. प्रदूषण संबंधी शोध संस्था नीरी और सीएसआईआर के रिपोर्ट में हुए खुलासे के आधार पर कानून मंत्रालय से मुर्गी पालन के लिए नये सिरे से नियम बनाने की सिफारिश की है.

छोटे पिंजरों वाले मुर्गे-मुर्गियां हो रहे संक्रमण के शिकार

राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग शोध संस्थान (नीरी) के निदेशक डा. राकेश कुमार की अगुवाई वाले दल ने हरियाणा स्थित देश के सात बड़े मुर्गी फार्म में पर्यावरण संबंधी हालात का अध्ययन किया. अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक छोटे आकार के पिंजरों में रखे गये मुर्गे-मुर्गियां भीषण गंदगी से फैलने वाले संक्रमण के शिकार हो जाते हैं. इसका असर इनके अंडे और मांस में भी पाया गया है. वहीं  बड़े आकार वाले मुर्गी फार्म में खुले में रखे गये मुर्गे-मुर्गियां इस प्रकार के संक्रमण से बचे हैं.

मुर्गी पालन के लिए नये नियम बनाने का आदेश

छोटे पिंजरों की गंदगी के अलावा अंडे और मुर्गों को बाजार तक ले जाने के तरीके को भी इस समस्या का दूसरा प्रमुख कारण है. सीएसआईआर और सीरी की इस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते हुये गृह मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से मुर्गी पालन संबंधी नियमों की समीक्षा कर अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक नये नियम बनाने को कहा है.

मुर्गी पालन के लिए नियम बनाने का अनुरोध

केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को पत्र लिख मुर्गी पालन के लिए नियम बनाने का अनुरोध किया. पत्र में रिजीजू ने मुर्गी फार्म में विकसित किये जाने वाले ब्रायलर मुर्गे-मुर्गियों के पालन, रखरखाव और मंडियों तक भेजने के तरीकों का जिक्र किया. रिजीजू ने इसके लिए सरकार से व्यवस्थित नियम बनाने की सिफारिश की है. इस बारे में कानून मंत्रालय की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी

प्रत्येक मुर्गे के लिये कम से कम 450 वर्ग सेंमी की जगह होनी चाहिये

भारतीय मानकों के अनुसार मुर्गी फार्म में प्रत्येक मुर्गे के लिये कम से कम 450 वर्ग सेंमी की जगह होनी चाहिये. जबकि इन फार्मों में पिंजरों में बंद मुर्गे-मुर्गियों मानक से पांच गुना कम जगह मिलती है. नतीजतन भूसे की तरह पिंजरों में बंद पक्षी ठीक से गर्दन भी नहीं उठा पाते हैं. इससे न सिर्फ इनकी गर्दन की हड्डी टूट जाती है बल्कि आपस में रगड़ने से पंख भी टूट जाते हैं. इससे शरीर पर हो रहे जख्म पक्षियों में संक्रमण का कारण बन रहे हैं.

पक्षियों के भोजन-पानी में मल-मूत्र का मिलना भी संक्रमण का कारण

पिंजरों में बंद पक्षियों के भोजन-पानी में मल-मूत्र का मिलना और इससे उपजी भीषण दुर्गंध, संक्रमण की दूसरी वजह है. यही स्थिति चूजों के पालन पोषण में भी देखी गयी है. रिपोर्ट के मुताबिक चूजों को दी जाने वाली जरूरी एंटीबायोटिक दवाओं में कमी और टीकाकरण का अभाव के कारण इनकी मृत्यु दर बड़ रही है.

छोटे पिंजरों में पक्षियों को भरकर बाजार भेजने के दौरान मुर्गे-मुर्गियों को लगने वाली चोट पक्षियों की पीड़ा और संक्रमण की समस्या को चरम पर पहुंचा देती है. पक्षियों के जख्मी हालत में पाये जाने का सबूत इनके अंडों के खोल में लगे खून के धब्बों से भी मिलता हैं. इतना ही नहीं संक्रमण और जख्म से मरने वाले पक्षियों के शव को नष्ट करने में भी मानकों का पालन न होना मुर्गी फार्म में प्रदूषण का कारण बन रहा है.

 

 

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