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जो कहते थे बेटी को बेकार के खेल में लगा दिया.. वही मेडल्स देख नाज करते हैं

Sakshi Agrawal

Ranchi: यह कहानी है 14 वर्षीय खुशबू कुमारी की. जिन्होंने झुग्गी झोपड़ी में रहते हुए जो कर दिखाया वह संघर्षशील युवतियों के लिए किसी मिसाल से कम नहीं. विपरीत परिस्थिती में भी कभी अपने सपने से समझौता नहीं किया. दस साल की उम्र से किक बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रही हैं और अपने पहले ही मैच में उन्होंने स्वर्ण पदक अपने नाम किया. राज्यस्तर, जिलास्तर और राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने पांच स्वर्ण, तीन सिल्वर और दो कांस्य पदक जीता है. खुशबू आगे चल कर इसमें अपना करियर बनाना चाहती हैं.

रिंग में ही नहीं लोगों की रूढ़ीवादी सोच से भी लड़ना पड़ता है

खुशबू बताती हैं कि उनके लिए यह राह कभी भी आसान नहीं रही. बता दें कि खुशबू रांची एयरपोर्ट के पास झुग्गी झोपड़ी वाली बस्ती में रहती है. रिंग तक पहूंचने के लिए उन्हें पहले लोगों की रूढ़ीवादी सोच से लड़ना पड़ा. वह कहती हैं कि घर का स्पोर्ट नहीं रहता तो उनका यह सपना सपना ही रह जाता. क्योंकि लोगों के तानों से कई बार हिम्मत टूटी, हालांकि हर बार घरवालों ने संभाला. लोग मां- पिता से भी कहते घर की लड़की को बेकार के खेल में लगा दिया है. कई बार उनकी ऐसी बातें सुनकर मेरा हौसला डगमगाता, पर हर बार पिता ने हिम्मत बढ़ाई. खुशबू ने बताया कि पिता पेशे से ड्राइवर हैं पर बेटी को कामयाब खिलाड़ी के तौर पर देखना चाहते हैं और फिलहाल वह बुंडू में आगामी 16 और 17 सितंबर को थर्ड स्टेट लेवल मैच की तैयारी में लगी हुई हैं.

सुविधा का है अभाव

खुशबू के ट्रेनर मो. इबरार कुरैशी बताते हैं कि स्टूडेंट्स में क्षमता की कमी नहीं है. कमी सुविधा की है. बॉक्सिंग किट खरीदना उनके लिए आसान नहीं. यही वजह है कि क्षमता होने के बावजूद प्रॉपर प्रैक्टिस नहीं हो पाती है और यहां के खिलाड़ी नेशनल में अपनी जगह नहीं बना पाते हैं. सरकार की ओर से भी खिलाड़ियों को कोई सुविधा मौहिया नहीं कराई जाती है. अगर इन्हें प्रोपर ट्रेनिंग मिले तो यहां के लोग भी देश-विदेश में अपनी पहचान बना सकेंगे.

किक बॉक्सिंग से बढ़ा आत्मविश्वास

खुशबू बताती हैं कि वह रोजाना चार घंटे प्रैक्टिस करती हैं. सुबह स्कूल जाने से पहले दो घंटे और शाम में दो घंटे प्रैक्टिस करती हैं. किक बॉक्सिंग से आत्मविश्वास भी बढ़ा है. पहले शाम में अकेले निकलने से डर लगता था पर अब निडर हो कहीं भी आ जा सकती हैं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि वह अपनी रक्षा खुद कर सकती हैं.

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