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पोस्टरों का नेता जब तक जनता का नेता नहीं बनेगा, झारखण्ड की दुर्दशा जारी रहेगी

Roopak Raag

सरकार ने मोमेन्टम झारखंड के जरिये राज्यवासियों को तरह-तरह के सपने दिखाये. इस महा-आयोजन पर राजकोष से करोड़ों रुपये खर्च किये गये. मगर इसका नतीजा क्या निकला. इस मोमेन्टम झारखंड के केन्द्र में राज्यवासियों का कोई हित था भी या नहीं. यह सवाल हर बीतते पल के साथ गहराता जा रहा है. देश-दुनिया में झारखंड को ‘बेस्ट इंवेस्टिव डेस्टीनेशन’ प्रचारित करने के पीछे असल मकसद क्या था. इसकी परत दर परत पोल अब खुलती जा रही है. झारखंड में निवेश का क्या माहौल है इसके बारे में लोगों को बताने की जरूरत नहीं. आए दिन अखबारों में खबर पढ़ने को मिलती हैं कि ये कंपनी झारखंड से चली गई तो कभी सुनने को मिलता है कि एमओयू के बाद भी कंपनी अब यहां निवेश नहीं करेगी.

एमओयू का फर्जीवाड़ा

मोमेन्टम झारखंड में जिन कंपनियों ने एमओयू किये उनके भी फर्जीवाड़े अब सामने आ रहे हैं. न्यूज विंग के रिपोर्टर अक्षय जब मोमेन्टम झारखंड में निवेश करार करनेवाली कंपनियों की पोल खोल रहे हैं, उस वक्त भी राज्य के सीएम विदेश में निवेश का आग्रह लिये घूम रहे हैं. सवाल है कि झारखंड केवल कंपनियों और सरकार के बीच निवेश करार से ही संतुष्ट रहेगा या बात आगे भी बढ़ेगी. झारखंड बनने के समय जन्मे बच्चे आज काॅलेज में पढ़ रहे हैं. इस दौरान झारखंड की विभिन्न पार्टियों की विभिन्न सरकारों ने दर्जनों की तादाद में निवेश का एमओयू किया. लेकिन उनमें कितने प्रोजेक्ट जमीन पर देखने को मिले हैं. छोटी-मोटी कंपनियों की बात तो छोड़ दें, टाटा, मित्तल जैसी कंपनियों के लाखों करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट सरकारी स्तर से लटके हुए हैं.

पहले जो MOU हुए, उसका क्या हुआ

प्रथम सीएम बाबूलाल से लेकर अर्जुन मुण्डा, हेमंत सोरेन और रघुवर दास, कोई भी ऐसे मुख्यमंत्री नहीं हैं जिनके कार्यकाल में कंपनियों के साथ निवेश करार नहीं हुए. स्पेशल इकोनाॅमिक जोन बनाने से लेकर क्षेत्रीय औद्योगिक विकास प्राधिकरण की बातें की जाती रहीं, मगर 17 सालों का हिसाब झूठ-फरेब के छोटे से शब्द में सिमट जाते हैं. यह सामान्य सी बात है कि निवेशक तभी आते हैं जब उन्हें माकूल माहौल मिलता है. झारखंड में निवेश करार तो लाखों करोड़ों रुपये के सैकड़ों कंपनियों के साथ हुए, मगर हमारी तैयारी क्या है? अब तक तो तमाम मुख्यमंत्री केवल एमओयू साइन कराकर ही खुश हो जाते रहे हैं. अपनी पीठ आप ही थपथपा लेते हैं. अपनी उपलब्धियों का प्रचार भी कर लेते हैं. मगर सच्चाई यह है कि कुछेक छोटी कंपनियों के अलावे निवेश नहीं हुआ है.

निवेश कोई एकपक्षीय मामला नहीं 

बिना बिजली, पानी, जमीन, एनओसी, सुरक्षा के कोई भी कंपनी झारखंड का रुख नहीं करेगी. हमने देखा है कि पहले से ही कई कंपनियां झारखंड से बोरिया-बिस्तर समेट कर जा चुकी हैं.

याद रखना होगा कि निवेश कोई एकपक्षीय मामला नहीं है. इसमें हमेशा तीन पक्ष होंगे ही- सरकार, कंपनियां और रैयत. देश-दुनिया में निवेश का कटोरा लेकर घूमने से पहले क्या सरकार ने अपने लोगों को (झारखंडवासी) विश्वास में लिया? पहले से ही प्रचंड विस्थापन का दंश झेल रहे राज्य में एक सर्वसम्मत पुनर्वास नीति तक नहीं. सर्व-सम्मत औद्योगिक नीति नहीं. जो है उसमें केवल सरकार ही सकरार है. पुनर्वास नीति और औद्योगिक नीति बनाने से पहले क्या सर्वे किया गया? ग्रामीण रैयतों से सलाह-मशविरा किया गया? ऐसे में रैयतों और सरकार के बीच टकराव अप्रत्याशित नहीं है. क्या सराकर ने स्थानीय भूमि संरक्षा के कानूनों को संवेदनशील तरीके से जनभागीदारी सुनिश्चित करते हुए हल करने की कोशिश की है?

ऐसे में लाखों करोड़ तो दूर एक रुपया भी निवेश नहीं होगा

ऐसा नहीं कि सरकार इन सबसे अंजान है. उन्हें भी पता है कि निवेश तभी होगा जब निवेशकों को आधारभूत संरचनाओं के साथ सुरक्षा एवं अन्य जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी. स्थानीय लोगों की शंकाओं को सरकार गोली चलाकर दूर नहीं कर सकती. पोस्टर लगाने या विदेश घूमने से भी निवेश नहीं होगा. किन क्षेत्रों में निवेश करना है, किस तरह के उद्योग लगाने हैं, मेगा इंडस्ट्रीज लगने हैं या लघु-कुटीर उद्योगों पर जोर देना है, यह तक तय नहीं है. ऐसे में एक तो क्या हर रोज भी मोमेन्टम झारखंड जैसे महा-आयोजन किये जायें तो भी एक रुपया निवेश नहीं होगा. पोस्टरों का नेता जब तक जनता का नेता नहीं बनेगा तब तक ऐसे खर्चीले आयोजन कर अपनी नाकामी को छुपाने का तमाशा होता रहेगा.

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