Skip to content Skip to navigation

Add new comment

डॉग-कैट शो बनाम राजसत्ता, मीडिया मालिकों और पत्रकारों के बीच का संघर्ष

Roopak Raag

सत्ता का खिलौना बनी पत्रकारिता

प्रेस की आजादी और पत्रकारों की स्वतंत्रता दो अलग-अलग बातें हैं. प्रेस एक संस्थान है, जबकि पत्रकार एक व्यक्ति. पत्रकारिता इन दोनों की सामूहिक प्रक्रिया है. जब कोई कहता है कि पत्रकारिता में ह्रास हो गया है, तो यह दोष दोनों पर होता है. मगर चूंकि पत्रकार ही प्रेस का प्रत्यक्ष चेहरा होता है और वह समाज में सक्रिय होता है, इसलिए पत्रकारिता में गिरावट की सारी जिम्मेदारी उसी पर थोप दी जाती है.

मगर यहां गौर करना होगा कि हर सूरत में संस्थान व्यक्ति से अधिक शक्तिशाली होता है. पत्रकारिता के चारित्रिक पतन के लिए पत्रकारों से अधिक मीडिया संस्थान दोषी हैं. हर मीडिया हाउस का एक राजनीतिक एजेंडा होता है और उससे भी बड़ा उसका व्यापारिक हित. व्यापारिक फायदे के लिए राजनीतिक पाले बदल भी लिये जाते हैं. यह तब और भी शर्मनाक रूप से सामने आता है, जब सत्ताधारी दल की सांठगांठ मीडिया संस्थानों से हो जाती है. मीडिया हाउस उस राजनीतिक दल को फायदा पहुंचता है और बदले में सत्ता की तरफ से विज्ञापन, व्यापार और लॉबिंग के कई लाभ पाता है.

दो शक्तिशाली प़क्षों- पहला मीडिया हाउस और दूसरा सरकार के बीच एक पत्रकार जो 10 से 30 हजार की नौकरी करता है, उसका वजूद क्या होगा.

मीडिया संस्थानों के व्यापारिक हित, राजसत्ता का दबाव और पत्रकार

पत्रकार को उस हद तक ही लिखने की आजादी है, जहां से मीडिया संस्थान का व्यापारिक और राजनीतिक अहित शुरु नहीं हो जाता है. संपादक को मैं श्रमजीवी पत्रकारों की श्रेणी में नहीं रखता. वे संस्थान के ही बिजनेस मैनेजर होते हैं. उनका काम संस्थान के व्यापारिक हित में खबरों की फिल्टरिंग, राशनिंग, मोल्डिंग, सेन्सरिंग तक सीमित होती है. कुछेक संपादक कभी-कभार कुछ लिख भर दें मगर उनकी लेखनी को भी जब क्रिटिकली एनालाइज किया जाए, तो पता चलता है कि यह भी किसी खास आर्थिक-राजनीतिक मकसद से ही लिखी गई है.

झारखंड की बात करने से पहले अभी राष्ट्रीय हलचल पर गौर करते हैं.

thewire.com पर छपी एक घटना का जिक्र

14 सितंबर 2017 को टाईम्स ऑफ इंडिया की वेबसाइट से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की कलई खोलने वाली एक खबर को कुछ समय के भीतर ही हटा लिया गया. रोसम्मा थॉमस की स्टोरी राजस्थान में फसल बीमा योजना की आड़ में चले रहे बड़े खेल को उजागर करती थी.

पत्रकार ने साबित कियाा था कि कैसे फसल बीमा दरअसल किसानों का सुरक्षा कवच नहीं बल्कि सरकार की मदद से बीमा कंपनियों की कमाई का जरिया बन गया है. 2016 में मोदी सरकार द्वारा लांच इस स्कीम से बीमा कंपनियों को करीब 10 हजार करोड़ रुपये का फायदा हुआ. बीमा कंपनियों को सरकार की तरफ भारी रकम बतौर प्रीमियम अदा की गई. जबकि उसके मुकाबले किसानों की तरफ से फसल बर्बादी के क्लेम दर्ज नहीं हुए.

पत्रकार रोसम्मा थॉमस ने मामले की जांच की और पता लगाया कि जब मौसम की मार की संभावना अधिक होती थी, तो 80 प्रतिशत फसलों का बीमा नहीं किया जाता था. कोई भी अधिकारी इंस्पेक्शन में नहीं आता था. जबकि मौसम ठीक रहने पर बीमा का काम सक्रियता से किया जाता था.

इस तरह राजस्थान सरकार, अफसरों और बीमा कंपनियों की मिलभगत से हजारों करोड़ों रुपये का अवैध मुनाफा कमाया जा रहा था.

...और सत्ता के खिलाफ खबर हटा ली गई

इस खबर को हटाये जाने के बारे में टाईम्स ऑफ इंडिया नेटवर्क के प्रमुख रंजन रॉय ने कहा कि यह ऑनलाइन डेस्क द्वारा लिया गया निर्णय है, जिसके बारे में मुझे अधिक जानकारी नहीं है.

toi.com के एडिटर प्रसाद सान्याल ने कुछ माह पूर्व ही पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद राजेश कालरा इंटरनेट एडिशन के प्रमुख बने हैं.

कालरा ने डेस्क को केवल सरकार के पक्ष में पॉजीटिव स्टोरी करने का निर्देश दे रखा है. सरकार के खिलाफ स्टोरी को कई बार रद्द किया गया. यहां तक कि इंडेक्स भी किया गया ताकि गूगल पर भी स्टोरी सर्च न की जा सके.

अमित शाह की संपत्ति में 300 % वृद्धि वाली खबर भी हटाई गई

फसल बीमा की स्टोरी हटाये जाने के संबंध में कालरा ने कुछ नहीं कहा. हास्यास्पद है कि नवभारत टाईम्स के वेब एडिशन ने गुड गवर्नेंस सेक्शन के तहत इस स्टोरी को इंटरनेट पर लगा दिया. नवभारत टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया की ही हिन्दी इकाई है.

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह पहली मर्तवा नहीं है. अमित शाह की संपत्ति में बीते 5 सालों में 300 प्रतिशत की वृद्धि की खबर को भी घंटे भर के भीतर बेवसाइट से हटा लिया गया था. उस वक्त भी इस मीडिया हाउस के द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया था.

एडिटरी और राजसत्ता से लाभ

टाइम्स ऑफ इंडिया के एक्जिक्युटिव एडिटर दिवाकर अस्थाना और पीएम मोदी के संबंधों का खुलासा तो जून में वायरल एक वाट्सएप्प मैसेज से हो चुका है. गलती से यह मैसेज टाइम्स ऑफ इंडिया के ही एक पत्रकार को चला गया था. अस्थाना, इकोनॉमिक टाइम्स के पूर्व और ओपेन पत्रिका के मौजूदा संपादक पी आर रमेश ने एक आयकर अफसर के संबंध में वित्त मंत्री जेटली से पैरवी की थी. कुछ समय बाद वह पैरवी फलीभूत भी हुई.

दूसरी घटना हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक बॉबी घोष को अचानक हटाया गया

हिन्दुस्तान टाईम्स के संपादक बॉबी घोष को अचानक हटाये जाने ने फिर से कई सवाल खड़े कर दिये हैं. एचटी की मालकिन शोभना भरतीया और नरेन्द्र मोदी की मुलाकात के बाद यह फैसला लिया गया. सरकार के उच्च पदाधिकारियों और भाजपा नेताओं ने संपादक घोष के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई थी. इसके बाद एचटी प्रमुख शोभना भरतीया और पीएम मोदी के बीच एक व्यक्तिगत मीटिंग हुई. मीटिंग के बाद प्रबंधन ने बॉबी घोष को पद से हटाने का ऐलान कर दिया.

HT प्रमुख पीएम मोदी से मिलीं और हटा दिए गए संपादक

बॉबी घोष ने बीते साल मई में एचटी में बतैार संपादक पद संभाला था. इससे पहले वे quartz और टाईम पत्रिका के इंटरनेशनल संस्करण के प्रबंध संपादक के रूप में काम कर चुके हैं. घोष एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के पत्रकार हैं. एचटी मीडिया ज्वाइन करने के बाद उन्होंने ‘हेट ट्रैकर’ नामक एक कॉलम चलाया था. इस कॉलम के निशाने पर भाजपा की राजनीतिक विचारधारा और नेता होते थे. इस कारण भाजपा के कई बड़े नेता ही नहीं कुछ मंत्री भी घोष से नाराज हो गए थे. मोदी और भरतीया की मीटिंग के बाद इसी का परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा.

एचटी प्रबंधन ने कहा कि घोष निजी कारणों से न्यूयॉर्क वापस जा रहे हैं. द वायर ने इसकी सच्चाई पता लगाने की कोशिश की. पीएम कार्यालय के अंदरूनी सूत्रों से पता चला कि पीएम मोदी ने भरतीया के सामने घोष की नागरिकता पर सवाल उठाये थे और संपादक के पद से हटाने का सुझाव भी दिया था. भरतीया ने इस मामले में अब तक कोई जवाब नहीं दिया है.

अब वापस झारखंड...

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग से जब मैंने पूछा कि आपका नाम तो सभी लेते हैं पर आपकी सक्रिय पत्रकारिता को कभी देखा नहीं. उनका जवाब था कि वो इतिहास की बातें हैं. अब कोई भी संपादक और मीडिया हाउस मुझे नौकरी नहीं दे सकता. उनकी बातें झूठी लगीं पर आगे मैं विभिन्न मीडिया संस्थानों में काम कर इस बात को अच्छी तरह समझ गया. एक अखबार के संपादक ने तो मुझे कहा कि अपने अखबार में गरीबों की फोटो छापना मना है. वैसे लोगों की खबरें और फोटो ही छापें जिनकी कोई परचेजिंग कैपेसिटी यानी क्रय शक्ति हो ताकि विज्ञापनदाताओं को भी फायदा हो. अगले दिन अखबार देखा तो मोरहाबादी के डॉग शो पर पन्ने भर की रिपोर्ट थी.

डॉग-कैट शो बनाम लंकेश की हत्या

अभी हाल के दिनों में मुखर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या हुई. रांची के डेढ़ सौ से अधिक बुद्धिजीवी, साहित्य-संस्कृतिकर्मी ने विरोध-प्रदर्शन किया. मगर उसकी खबर सभी अखबारों में एक से दो इंच में निपटा दी गई. भूमि-अधिग्रहण, सांप्रदायिक हिंसा और राज्य भर में बच्चों की मौतों पर रांची में एक कन्वेशन हुआ. उस खबर को भी सिंगल कॉलम में निपटा दिया गया. इसी बीच फेसबुक पर एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें प्रमुख अखबारों में संपादक भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की दरबार में गुफ्तगू करते नजर आए. फिर भाजपा कार्यालय और अखबारों के दफ्तरों के रंग में मुझे कोई फर्क नजर नहीं आने लगा. सत्ताधारी दल के नेताओं की बंडी और संपादकों के कुर्ते का मिजाज भी एकाकार हो गया. ऐसे में कोई श्रमजीवी पत्रकार कितनी भी मेहनत कर सत्ता की कारस्तानी को उजागर कर दे, संपादक और मालिक के स्तर से उसे रोकी जा सकती है या बदली जा सकती है या डीलिंग भी की जा सकती है. ऐसे में पत्रकारों को ही पत्रकारिता के ह्रास का दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

झारखण्ड के पत्रकारों का संघर्ष

झारखंड के पत्रकार ने पत्रकारों के वेतन के संबंध में मजीठिया बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने को लेकर संस्थान के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी. उनका तबादला कर दिया गया. लड़ाई ने शामिल अन्य पत्रकार मित्रों  की नौकरी बचाने के लिए उन्हें केस वापस लेकर संस्थान के साथ समझौता करने पर मजबूर होना पड़ा.

हत्याओं का सूत्रधार एक ही है

ऐसे में देश के बड़े मीडिया संस्थानों और सरकार के बीच सांठगांठ की हकीकत अब खुले तौर सामने आ रही हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स ही नहीं, हर जगह यही प्रक्रिया चल रही है.⁠⁠⁠⁠ सत्ता से खिलाफत करने वाले पत्रकारों की या तो राजनीतिक हत्या कर दी जाती है या संस्थानिक. गौरी लंकेश, शांतनु भौमिक की राजनीतिक हत्याएं हुईं और बॉबी घोष की संस्थानिक. पत्रकारों के दैहिक  और पेशेवर, दोनों तरह की हत्याओं का सूत्रधार एक ही है, जिसे हम राजसत्ता के नाम से जानते हैं. राजनीतिक और आर्थिक सत्ता.

Share

UTTAR PRADESH

News Wing Uttar Pradesh, 20 October: धनारी थानाक्षेत्र में पुलिस के साथ मुठभेड़ में एक इनामी बदमाश औ...
News Wing Pratapgarh, 20 October: लालगंज कोतवाली क्षेत्र के जसमेढा गांव में बाइक सवार बदमाशों ने पूर...
Website Designed Developed & Maintained by   © NEWSWING | Contact Us