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रीढ़विहीन व्यक्ति कुलपति बनेंगे, तो बीएचयू जैसी घटनाएं होती रहेंगी

मनोज कुमार

बहुत दुःख की बात है कि हमारे शैक्षणिक संस्थान गलत वजहों से चर्चा में रहते हैं. पहले रैगिंग की वजह से तो अब छेड़खानी की वजह से संस्थाएं बदनाम हैं. समृद्ध भारत का मार्ग इन्हीं संस्थानों से होकर जाता है, पर दुर्भाग्य आज ये संस्थायें राजनीतिक अखाड़ा में तब्दील हो चुके हैं. हमारे राजनेता इन संस्थानों का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए कर रहे हैं. इस मकसद की पूर्ति हेतु रीढ़विहीन, चापलूस और अयोग्य व्यक्ति को विश्व विद्यालयों में कुलपति बनाया जा रहा है.

ऐसे कुलपति अपने आका को खुश करने तथा संबंधित राजनीतिक दल की नीतियों के अनूकल कार्य करते हैं. अब अधिकांश महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई छोड़ कर सब कुछ होता है. शोध आदि तो गुजरे जमाने की बात हो गयी है. हां अनुदान हासिल करने के लिए नैक मूल्यांकन, सेमीनार आदि की खानापूर्ति होती रहती है. तमाम संस्थानों में शिक्षकों की भारी कमी है और जो शिक्षक कार्यरत हैं, उनमें दक्षता की कमी है.

वे पढ़ना ही नहीं चाहते हैं तो खाक पढ़ायेंगे ? परिक्रमा छाप शिक्षकों की चलती है. ट्रांसफर-पोस्टिंग की पारदर्शी नियम नहीं है. नियमित भर्तियां नहीं होतीं और होती हैं तो पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती हैं. कितना आश्चर्य की बात है कि 1.125 करोड़ से ऊपर की आबादी वाले देश में एक भी विश्व स्तर की शैक्षणिक संस्थान नहीं है. यूं भी विश्व के प्रख्यात संस्थायें दान से ही स्थापित व पल्लवित-पोषित हैं, पर हमारे यहां अपवाद छोड़ दें तो यह प्रवृति नहीं है. यहां मंन्दिरों को ज्यादा दान प्राप्त होते है, शैक्षिक संस्थानों को कम. सरकार भी अन्य देशों की तुलना में कम खर्च करती है, जीडीपी का. और हां धीरे-धीरे घटा ही रही है. ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में तमाम महाविद्यालय, विश्वविद्यालय अपनी गरिमा खो रहा है. 

ऊपर से प्राचार्य और कुलपतियों की अकर्मण्यता और अदूरदर्शिता इस क्षरण की गति को बढ़ा रहा है. शैक्षणिक वातावरण को दूषित करने में छात्र संगठनों की भी भूमिका बढ़ती जा रही है. छात्र संगठन भी छात्र हित की बात न कर खांटी राजनीति में सक्रिय है. अभी बीएचयू की ही घटना को लें तो छात्राओं की क्या मांग थी, यही न कि छेड़छाड़ बंद हो, चिन्हित स्थलों पर सीसीटीवी कैमरा लगाया जाये. क्या इस मांग को कोई सभ्य समाज गलत ठहरा सकता है ? पर हुआ क्या ? कुलपति बात ही नहीं किये और उल्टा लाठी चार्ज करवा दिए तथा पीड़ित को ही दोषी ठहराने और विपक्ष को टारगेट करने का असफल प्रयास करने लगे.

आंदोलनकारी का विचारधारा कुलपति के विचारधारा से भिन्न भी हो तो क्या उनके जायज मांग को नहीं सुनेंगे ?विपक्ष का काम ही है कि सत्ता व उसके एजेंसियों के गलत काम का विरोध करे और पीड़ित के साथ खड़ा हो. तो क्या कुलपति विपक्ष को टारगेट करेंगे ? क्या गिरीश चन्द्र त्रिपाठी का यह कहना कि छेड़छाड़ केवल बीएचयू में ही नहीं सभी विश्व विद्यालयों में होता है, यह उचित है और वह भी इस वक्त ? उनका ये कहना कि बाहरी तत्वों का हाथ है. क्या वे जांच एजेंसी व जज हैं ? उनका यह भी कहना कि सभी शिकायतकर्त्ता से मिलना संभव नहीं. सब से मिलते रहेंगे तो विश्वविद्यालय ही नहीं चला पाउंगा. क्या उचित है ? धन्य हो आयुक्त का जिन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किये हैं. यह दुखद घटना त्रिपाठी जी की प्रशासनिक अक्षमता का प्रकटीकरण हैं. 

यदि समय रहते हम नहीं चेतेंगे और सकारात्मक कदम नहीं उठायेंगे तो ये संस्थायें शिक्षा बांटने की जगह केवल डिग्री बांटने का काम करता नजर आयेगा. कितना अच्छा मैसेज जाता, जब हमारे लोकप्रिय पीएम मोदी सर उन आंदोलनकारी छात्राओं के बीच जाते और पूछते कि "बोलो बेटा क्या हुआ ? मैं क्या मदद कर सकता हूं ? यह मैसेज तमाम चापलूस कुलपतियों के लिए एक चेतावनी होता, पर ऐसा नहीं हो सका.

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