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मिट्टी की मूर्तियां बनाकर बच्चों का पालन-पोषण कर रहीं फूलमणि

साक्षी अग्रवाल 

Ranchi, 26 September : पति की मौत के बाद जैसे जिंदगी ठहर सी गई थी. तीन बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेवारी और उनके लिए दो जून की रोटी जुगाड़ना आसमान से तारे तोड़ लाने जितना मुश्किल लगता था. पर अगर इंसान में हुनर हो और हार न मानने की जिद हो तो परिस्थितियों को भी घुटने टेकने पड़ते हैं. नम आंखें औऱ चेहरे पर विजयी मुस्कान के साथ यह बातें पहाड़ी कुम्हार टोला निवासी 38 वर्षीय फूलमणि देवी उर्फ गोपाल चाची कहती हैं.

गोपाल चाची कहती हैं हौसला हो तो हार को भी हराया जा सकता है

फूलमणि के पति गोपाल प्रजापति पेशे से मूर्तिकार थे और उनकी कमाई से ही घर चलता था. फूलमणि बताती हैं कि मूर्ति बनाने में वह हमेशा अपने पति का सहयोग करती थीं. यह कभी नहीं सोचा था कि शौक-शौक में सीखी कला एक दिन उनके जीना का सहारा बनेगी. पति के असामयिक मौत के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गई थी. ऐसे में उनके इस कला ने ही जीने का हौसला दिया. 

बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूं 

अपने मौहल्ले में फूलमणि गोपाल चाची के नाम से प्रसिद्ध हैं. उन्होंने बताया कि पति की मौत के बाद उन्होंने प्रतिमा बनानी शुरू की. कोई सहारा नहीं था. बच्चे भी छोटे थे.

विश्वकर्मा पूजा से लेकर चित्रगुप्त पूजा तक भगवान की प्रतिमा बनाती हैं. बाकी पूरे साल मिट्टी का तंदूर (चुल्हा) बनाकर बेचती हैं. अब उनके इस काम में तीनों बच्चे (डॉली, प्रियंका और प्रभाकर) भी सहयोग करते हैं. वह कहती हैं कि वह अपनी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हैं ताकि विपरित परिस्थितियों में भी किसी के सामने सर झुकाने की नौबत ना आए. विश्वकर्मा पूजा के एक महीने पहले से मूर्ति बनाने की तैयारी शुरू कर दी जाती है.

आठ फीट मुर्ति की कीमत 15000 रुपए

दुर्गा पूजा को लेकर उन्होंने दुर्गा मां की ढेरों प्रतिमाएं बनाई हैं. इस साल सबसे बड़ी प्रतिमा आठ फीट ऊंची है. इसकी कीमत 8000 रुपए से लेकर 15000 रुपए है. फूलमणि की 16 वर्षीय बेटी प्रियंका बताती हैं कि सरस्वती पूजा के समय घर का माहौल ही अलग होता है, इस दौरान सबसे ज्यादा ऑडर मिलता है. गोपाल चाची का कहना कि कई बार लागत से कम में ही मूर्ति बेचनी पड़ती है. मगर फिर भी इसी कला ने हमें सहारा भी दिया है.

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