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सृजन हेल्प में मिल रही है दिव्यांग बच्चों को जीवन की नई दिशा

Md.  Asghar Khan

Ranchi, 24September:  कोमल, पायल, विमल, निशांत अमन, दीक्षा अब नमस्ते, पैर छूना और लोगों को हैय-हेलो करना सिख चुके हैं. अपना नाम- पता भी बोल-लिख लेते हैं. यही नहीं टीवी पर मोटो- पतलू” जैसे कार्टून के कार्यक्रम को देख चहक उठते हैं. लेकिन फिर भी “वो हम जैसे क्यों नहीं है” ये सवाल ऐसे स्पेशल चाईल्ड से मिलने पर जेहन में जरूर उठने चाहिए. मुझे भी इसका अहसास तब हुआ जब मैं रांची के पहाड़ी मंदिर के पास चल रही सृजन हेल्प में मंद बुद्धि, मूक बधिर बच्चों से मिला. अपने आवास में इस संस्था को चला रही गुंजन गुप्ता का भी दर्द इन बच्चों से कम नहीं है शायद यही वजह थी उन्होंने इसे दिल से महसूस किया और अपना जीवन इनकी सेवा में समार्पित कर दिया.

धन-मन लगाकर लग गई खुशी देने में

इस पूरी कहानी का कारवां इनकी 23 वर्षीय बेटी जूही से शुरु हुई, जो एक स्पेशल चाइल्ड है. इसके इलाज के लिए गुंजन ने हिंदुस्तान का हर एक कोना छान मारा, लेकिन हर जगह के  डॉक्टरों ने इसे लाइलाज बताया. आगे कहानी में कड़ियाँ जुड़ती गई और गुंजन ने फैसला किया कि वे इन बच्चों लिए स्कूल खोलेंगी. फिर अपना तन मन धन लगाकर लग गई ऐसे दिव्यांग बच्चों को ख़ुशी देने में.

दूसरों का गम देख, वो अपना दुख भूल गई

गुंजन गुप्ता बताती हैं कि जूही तब तीन साल की थी, जब मैंने महसूस किया कि वो कुछ बोल नहीं पा रही है. डॉक्टर को दिखाने पर बता चला मेरी बच्ची स्पेशल चाइल्ड हैं. जूही को लेकर मैं और परेशान रहने लगी. फिर इस उम्मीद में  रांची,पटना, दिल्ली, मुंबई, कोलकत्ता का चक्कर लगाने लगी कि जूही किसी तरह ठीक हो जाये. लेकिन सभी जगह के डॉक्टरों ने स्पेशल चाइल्ड वाली ही बात कही. डाक्टरों के मुताबिक मेरी बच्ची का मानसिक विकास  नार्मल बच्चों की तरह नहीं हो सकता है. गुंजन कहती हैं कि अब मैं मंदिर,मस्जिद, गुरुद्वारा, गिरजा घर गईं, दुआएं मन्नित मांगी, लेकिन कुछ नही हुआ. 2006 तक यही सिलसिला चला. फिर एक उम्मीद की किरण लिए 2009 में सिकंदराबाद के मेंटल अस्पताल NIHM गई. वहां डॉक्टरों ने मेरे बच्ची पर बहुत मेहनत किया, लेकिन जुही वैसी ही रही. मुझे वहां कहा गया कि धीरे धीरे मानसिक विकास होगा, पर इतना नहीं की आप इसका विवाह कर घर बसा सकें. यहां इलाज के दौरान मैंने उन माओ को देखा जिनके बच्चे की स्थिति जूही से कही ज़्यादा दैनिये थी. फिर उनलोगों का गम देख मैं अपना दुख भूल गयी. तब ऐसे ही बच्चों को सवारने की कसम खा ली.



जूही की शादी के लिए रखा सारा पैसा लगा दिया

सिकंदराबाद से रांची वापस लौटकर गुंजन और उनके पति संजय ने मुहल्ले में ऐसे 350 बच्चों का पता लगाया जोकि स्पेशल चाइल्ड पहले सात बच्चियों को घर लाकर, उन्हें खान-पीना और खेलना सिखाने लगी. धीरे धीरे बच्चों की संख्या सात से सत्तर हो गयी. 2011 में सुसाइटी एक्ट के तहत सृजन हेल्प नाम से संस्था का रजिस्ट्रेशन करवा लिया. गुंजन बताती हैं कि जूही की शादी के लिए जमा चार लाख रुपये को संस्था में लगा दिया. अब यहां प्रतिदिन 70 बच्चे आते है. इनके लिए चार स्पेशल एजुकेटर है, जिन्हें चार हजार रुपये प्रति माह देती हूँ. इनके खानपान और खिलौने में भी काफी राशि खर्च होती है. लेकिन आज तक किसी से भी एक पैसे का अनुदान नहीं मिला है.

जनता दरबार से वापस लौटा दिया गया

शहर में चलने वाली ऐसी संस्था को नीजी और सरकारी अनुदान मिलता है. गुंजन ऐसे बच्चों संबंधित मीटिंग में भी जाती है, जहां उन्हें किसी तरह का अनुदान नहीं मिलता है. गुंजन सरकारी अनुदान के लिए मुख्यमंत्री रघुवर दास के जनता दरबार तक गयी, लेकिन वहां उनकी किसी ने नही सुनी. उन्हें यह कहकर लौट दिया गया कि आपके पेपर को देखा जाएगा.



राष्ट्रपति से राज्यपाल तक ने किया है सम्मनित 

खेल कूद को लेकर बच्चों पर गुंजन ने विशेष तौर पर मेहनत किया. मेहनत इतना कि यहां के दिव्यांग बच्चे-बच्चियों ने नेशनल गेम में गोल्ड तक जीते. ड्राइंग में रीमा कुमारी को राष्ट्रपति ने सम्मानित किया . जबकि तीन बच्चों को राजयपाल द्वारा पुरस्कृत किया गया.

283 लड़कियों का घर बसाया

जूही की कभी शादी न होने का मलाल गुंजन को इतना हुआ कि उन्होंने गरीब लड़कियों के घर बसाने का बीड़ा उठा लिया. दूसरे लोगों के सहयोग से गुंजन ने अबतक 283 लड़कियों की शादी करवा चुकी हैं.

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