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ऐशो आराम में डूबे शासकों का अंत हर दौर में हुआ है, झारखंडी संदर्भ भी यह आकार ले रहा

रूपक राग

भाजपा अध्यक्ष को हम किस तरह देखते हैं. वे पार्टी के अध्यक्ष हैं मगर सरकार से बाहर हैं. इसके बावजूद सरकारी फैसलों और नीतियों को प्रभावित करने की असीम शक्ति रखते हैं. भाजपा शासित जिन भी राज्यों में वे जाते हैं. पूरी सरकार जैसे उनके सामने बिछ जाती है. अभी 15 से 17 सितंबर के बीच वे झारखंड दौरे पर आ रहे हैं. उनके आने को लेकर झारखंड सरकार द्वारा इतनी तैयारियां की गईं हैं जैसे देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री आ रहे हों. पूरी की पूरी राजधानी उनके स्वागत में होर्डिंग्स, पोस्टरों, कट-आउट्स से पट गई है. यहां तक कि जिन रास्तों और जिन जगहों का वे दौरा करने वाले हैं, पूरे मार्ग पर अमित शाह ही अमित शाह नजर आ रहे हैं. हमारे रघुवर दास तो खैर हर पोल, खंभे, चौराहे, दीवारों पर तैनात दिखते ही हैं. अब अमित शाह आ रहे हैं तो हमारे सीएम का भी पोस्टरी उत्साह कई गुना बढ़ गया है.

क्या यह एक लोकतांत्रिक शासन का चरित्र है ? 

झारखंड दौरे में बिरसा की जन्मस्थली उलिहातू का अमित शाह दौरा करेंगे. उनके स्वागत में वहां के स्कूल का ऐसा कायाकल्प हुआ कि लॉन में भी टाइल्स लगा दिए गए हैं. उनके आने की सूचना मिलते ही सचिव स्तर के नौकरशाहों ने उलिहातू में विकास का मोर्चा संभाल लिया. मन में सवाल उठता है कि क्या यह एक लोकतांत्रिक शासन का चरित्र है ? जैसा राजा-रजवाड़ों के शासनकाल में होता था कि जहां राजा जाता था, वहां की व्यवस्था चमका दी जाती थी. उनके स्वागत में लोगों को फूल-मालाएं लेकर खड़ा कर दिया जाता था. रास्ते को सजाया जाता था. राजा को कोई तकलीफ न हो इसलिए मंत्री सुविधाएं भी दुरुस्त कर लेते थे. लेकिन यह केवल उन्हीं रास्तों में किया जाता था जहां से राजा गुजरने वाला होता था.

क्या अमित शाह के आने से पूर्व उस गांव में अच्छे स्कूल की जरूरत नहीं ?

कुछ ऐसी ही फीलिंग अमित शाह के झारखंड दौरे को लेकर भी हो रही है. अमित शाह आने वाले हैं और सरकार-प्रशासन उनकी खिदमत और आवभगत में सरपट लेट गई है. उलिहातू के स्कूल में ऐसी सुविधाएं बहाल की गईं कि महंगे प्राईवेट स्कूल भी फेल कर जाएं. चकाचक दीवारें, जरूरी शिक्षण सामान और स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर, हर तरह की सुविधाओं से स्कूल को संपन्न किया जा रहा. मगर सवाल उठता है कि क्या अमित शाह के आने से पूर्व उस गांव में अच्छे स्कूल की जरूरत नहीं थी.

जनता खुश हो या न हो, भाजपा-आरएसएस खुश तो कुर्सी पर खतरा नहीं

बिरसा मुण्डा का उलिहातू अपने आप में कम महत्व रखता है क्या ? तो फिर अमित शाह को दिखाने के लिए कि रघुवर सरकार अच्छा काम कर रही है, सरकार ने उस गांव का कायाकल्प किया है. ऐसा लगता है कि रघुवर दास जानते हैं कि जनता का काम हो या न हो, अगर भाजपा और आरएसएस के शीर्ष लोगों को खुश रखा जाए तो उनकी कुर्सी पर कोई खतरा नहीं है. सरकार और -झारखंडी नौकरशाहों द्वारा विकास के ऐसे छलावों से भाजपा और संघ के दफ्तर में रघु राज को अच्छे स्कोर मिल जाएंगे. 

अमित शाह के पांव जिस जमीन पर पड़ते हैं वहां विकास की गंगा

पारा शिक्षकों के भरोसे चल रहे -झारखंडी शिक्षा व्यवस्था की सच्चाई को शाह के शाही दौरे और रंग-रोगन से सजाया नहीं जा सकता. शिक्षक, शौचालय और प्रयोगशाला विहीन झारखंड के स्कूलों में बिलखती शिक्षा को राज्य सरकार बड़बोलेपन और होर्डिंग्स की आड़ में नहीं छिपा सकती. मतलब अमित शाह के पांव जिस जमीन पर पड़ते हैं वहां विकास की गंगा बहने लगती है. तब हम दुखी-पीड़ित झारखंडी चाहेंगे कि भाजपा अध्यक्ष के पावन पांव झारखंड के कोने-कोने में पहुंचे. हर गांव में अमित शाह जाएं. और उनके आने की खबर पाकर सरकार और नौकरशाह उन गांवों की सूरत बदल दें. 

मोदी के बाद सबसे ताकतवर चेहरा हैं अमित शाह

झारखंड के नौकरशाह भी जानते हैं कि अमित शाह अभी देश में कितने पावरफुल हैं. भारत में वे केन्द्रीय सत्ता के मौजूदा प्रतीक और मोदी के बाद सबसे ताकतवर चेहरा हैं. ऐसे में उनके दौरे का मतलब है कि खुद प्रधानमंत्री आ रहे हैं. छोटा जागीरदार तो अपने सामंत की खिदमत करता ही है. अमित शाह अपने (भाजपा) मातहत जागीरदारों (मुख्यमंत्रियों) की रिपोर्ट कार्ड तो रखते ही होंगे. हमारे मुख्यमंत्री तो विकास के मोर्चे पर लगातार चूकते जा रहे हैं. लोगों के मन में उनके प्रति गुस्से की भनक भाजपा शीर्ष को नहीं होगी, ऐसा संभव नहीं. खुद पार्टी में ही कई मंत्री और नेता ऐसे हैं जो दास और उनकी कार्यशैली को नापसंद करते हैं.

रोज ऐसी खबरें आ रही हैं जो सरकार की पोल खोलती हैं

पोस्टरों-विज्ञापनों में विकास के दावों के बीच रोज ऐसी खबरें आ रही हैं जो सरकार की पोल खोलती हैं. बेदाग, ईमानदार, स्थिर रघुवर सरकार के हजार दिन के विज्ञापन के ठीक नीचे कल दैनिक भास्कर में खबर छपी है- ‘‘अजमेर ब्लास्ट में उम्रकैद की सजा काट रहे देवेन्द्र गुप्ता की खातिरदारी, जामताड़ा कोर्ट परिसर में भाजपाइयों ने दी पार्टी’’. ऐसी खबरों से विकास का आडंबर एक पल में ही धू हो जाता है. 

स्मार्ट सिटी के तामझाम शिलान्यास से मौजूदा राजधानी की सूरत नहीं बदल जाएगी

पिछले 1-2 महीनों में ईलाज के बिना हुई बच्चों की मौतों, जहरीली शराब से गई जानों की सच्चाई को जगमगाते होर्डिंग्स से नहीं झुठला सकते. राजधानी और औद्योगिक क्षेत्रों में हर घंटे कटती बिजली, शहरों की बजबजाती नालियों, बेखौफ अपराध, सालों से बन रहे रांची-टाटा हाइवे को करोड़ों के विज्ञापनों से भी कैसे सजा देंगे. स्मार्ट सिटी के तामझाम शिलान्यास से मौजूदा राजधानी की सूरत नहीं बदल जाएगी. जिन पोलों और चौराहों पर विकास की उपलब्धियां गिनातीं सरकारी होर्डिंग्स लगे हैं वहां जाम में घुटते लोगों की पीड़ा को रघु सरकार आंकड़ों से खत्म नहीं कर सकती.

पूराने पोस्टर, होर्डिंग्स उतरे अब राजधानी की सड़कें शाहमय हो गईं

हमने देखा है कि कोई भी कार्यक्रम हाल के दिनों में हुए हैं, उनमें रघुवर दास की फोटो के साथ पूरी राजधानी होर्डिंग्स और कट-आउट से पट जाती है. यहां तक कि उसमें खुद सरकार के मंत्रियों को भी सम्मानजनक जगह नहीं मिलती. मोमेन्टम -झारखंड में हर तरफ -झारखंड के सीएम रघुवर दास ही नजर आ रहे थे. उसके बाद जब योग दिवस आया तो राजधानी योगमग्न रघुवर दास से पट गई. फिर गडकरी आए तो भी रांची नए पोस्टरों-होर्डिंग्स से पट गई. अभी रांची के हर खंभे और चौक-चौराहों पर सरकार के हजार दिन के जश्न का क्रेज चल रहा है. दो दिन बाद अमित शाह आने वाले हैं. पूराने पोस्टर, होर्डिंग्स, कट-आउट्स उतार लिये गए हैं. राजधानी की सड़के शाहमय हो गईं हैं.

क्या रुख अख्तियार करेगा झारखंडी जनता का गुस्सा किसी को नहीं पता

सोचता हूं देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल झारखंड की जनता को उन प्रचार होर्डिंग्स और कट-आउट से क्या लाभ मिलेगा. यह कोई जागरूकता अभियान का भी हिस्सा नहीं जो सरकारी खजाने से विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाएं. शराब-कबाब और शबाब में डूबे मुगल शासकों को भी पता नहीं चला था कि कब उनके सल्तनत की जमीन खिसक गई. विकास आडंबरों के बीच –झारखंडी जनता का आक्रोश बढ़ता जा रहा है. झारखंडी शासकों के प्रति उत्पीड़ित जनता का गुस्सा अलग-अलग रूपों में सामाने आ रहा है. आगे यह क्या रुख अख्तियार करेगा, सोचकर भयावह लगता है.

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