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क्यों बिना पैसे लिए 350 मुर्दों को नहा चुका है नदीम, पैसा लेकर गुसुल देना कैसे गलत और जायज भी

Md. Asghar Khan

Ranchi, 31 October: मुस्लिम परिवार में मैयत (मुर्दों) को गुसुल देने (नहाने) के लिए पास-पड़ोस से किसी पेशेवर (एक्सपर्ट) चाचा-भईया या जो मुर्दा नहलाने का व्यवसाय चलाते हैं उसे बुलाया जाता है. लोगों कि माने तो यह परंपरा-प्रवृति नई है, जबकि कई कहते हैं कि बहुत पुरानी भी है. आमतौर पर किसी के निधन पर उसे गुसुल देने से परिवार के लोग बचते हैं. लेकिन नदीम अख्तर इसे एक धारणा बातकर अर्धम मानते हैं. वो कहते हैं कि यह धर्म का हिस्सा नहीं, बल्कि लोगों ने इसे एक धारणा बना लिया है. मुर्दों को परिवार के किसी सदस्यों के द्वारा गुसुल नहीं देना क्षेत्रानुसार इसके कई तर्क और कुर्तक है, जिसका इस्लाम से कोई लेनादेना नहीं है. वहीं मैयत को स्नान देने के एवज में पैसा लेना या इसे पेशा बनाने को गलत बताते हैं. कहते हैं कि यह बेहद ही दूर्भाग्यपूर्ण बात है. यह काम अज्रों सवाब (पुण्य) का है, इसलिए मैं किसी की मैयत की खबर सुनकर उसे गुसुल देने पहुंच जाता हूं.

मुर्दों को रखकर किया जाता है इंतजार

2007 में मेरे एक परिचित का इंतेकाल (निधन) हो गया था. वहां डेड बॉडी रखकर लोग गुसुल देने वालों का इंतजार कर रहे थे, तभी मैं खुद गुसुल देने आगे बढ़ा. लोगों को समझाया कि गुसुल देना सवाब (पुण्य) और नेक काम है. इसे करने की पहली जिम्मेदारी रिश्तेदारों की होती हैं. बाप को बेटे के द्वार गुसुल दिया जाना इस्लाम के अनुसार बेहतर माना जाता है. दरसअल यह वाक्या नदीम अख्तर से जुड़ा हुआ है, और उन्हीं की जुबानी है. रांची के डोरंडा निवासी नदीम अख्तर पेशे से ठेकेदार हैं. पिछले दस वर्षों से बिना पैसे लिए मैयत को गुसुल देते आ रहे हैं और अबतक लगभग 350 मुर्दों को नहला चुके हैं. उनका कहना है कि मैं जहां भी ऐसे मौकों पर जाता हूं, उस परिवार के दो व्यक्ति को मुर्दों को नहालाने का तरीखा सिखा ही देता हूं. जबकि नदीम ने यह तरीखा अपने चाचा अताउर्रहमान से सीखा है, और एक दिन में तीन मुर्दे तक को गुसुल दे चुके हैं. उनका मानना है कि ऐसा करने वालों के अंदर इस्लामिक जानकारियों का अभाव हैं. धीरे-धीरे यह रिवाज खत्म हो रहा है.

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पांच सौ से पांच हजार तक होता है चार्ज

मुर्दों को नहलाने का चार्ज होता है. नदीम बताते हैं कि जो इसे पेशेवरढंग से करते हैं उनका चार्ज पांच सौ से पांच हजार तक है.

भ्रम और बुरा समझकर कतराते हैं लोग

समाजिक जानकारों की माने तो मुर्दों को नहलाना लोग आज भी समाज में बुरा समझते हैं. भ्रम में इससे कतराते या बचते हैं.

लोग कहते हैं कि जैसे पहले शादी-विवाह में विधवाओं की इंट्री पर रोक थी, वैसे ही मृतक के संबंधियों को नहलाने से रोका जाता है. दूसरी धारणा यह भी है कि लोग आज भी मुर्दों के पास जाने या उसे नहालने से डरते हैं.

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कैसे गलत और जायज भी

मुर्दों को नहलाने का पैसा लेना और उसे प्रोफेशन बनाना मौलानाओं के अनुसार गलत और जायज भी है. हलांकि ज्यादातर धर्मगुरू इसे गलत मानते हैं. इदारे शरीया नाजिमे आला झारखंड मौलाना कुतुबुद्दीन रिजवी इस रिवाज पर कहते हैं कि यह गलत है, मैंने बहुत ऐसे लोगों को देखा है, जिसने पैसा लेकर मैयत को गुसुल दिया हो. यह एक नेक और सवाब का काम है, इसे अपने ही लोगों को करना चाहिए. वहीं एक ही मदरसा देवबंद से पढ़कर निकले दो मौलाना इस पर अलग-अलग राय रखते हैं. रांची कोकर स्थित रमजान मस्जिद के खतीब मौलाना डॉ सलमान कासमी कहते हैं कि मुर्दों को पैसा लेकर नहलाना शरई एख्लाक (व्यवहार) से बाहर हैं. एक मोमिन का दूसरे मोमिन के प्रति यह हक है कि वोह गुसुल दें. गावों में आज भी रिश्तेदार, दोस्त या करीबी ही मैयत को गुसुल देते हैं. शहरों में ऐसा रिवाज है कि मैयत को नहलाने वाला कोई पेशेवर होता है. इसे रोकने की जरुरत है. लेकिन मेनरोड स्थित इकरा मस्जिद के खतीब मौलाना डॉ उब्बैदुल्ला कासमी पैसा लेकर मैयत को गुसुल देने को सही और जायज मानते हैं. वो कहते हैं कि नमाज पढ़ाने वाले की जब तनख्वाह होती है, तो मैयत को गुसुल देने वालों को पैसा देना गलत नहीं है. अगर कोई नहीं लेता तो वो अच्छी बात है, लेकिन मांगने पर देना चाहिए, और इसमें कोई बुरी बात नहीं है. उन्होंने इसपर पाकिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां तो जनाजे की नमाज पढ़ाने का भी पैसा दिया और लिया जाता है. वो इसके लिए मोहमम्मद साहेब के समय में घटी ऐसी घटना का भी जिक्र करते हैं.

 

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