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ये कैसा न्याय...शादी के बाद क्यों बदलती है सिर्फ महिलाओं की जिंदगी

Manjusha Bhardwaj

हमारे समाज में शादी को एक बेहद ही पवित्र बंधन माना जाता है. शादी के बाद बहुत से बदलाव आते हैं. एक लड़की जो कल तक कुंवारी थी आज शादी शुदा हो जाती है. जिस घर में उसने अपना बचपन गुजारा वही घर शादी के बाद उसके लिए पराया हो जाता है. घर बलदला है, परिवार बदलता है, रिश्ते बदलते है, माहौल बदलता है. लेकिन क्या कभी किसी ने यह सोचा है कि ये बदलाव सिर्फ एक महिला के साथ ही क्यो होते हैं. क्यों ये बदलाव महिला की जिंदगी के साथ-साथ उसको भी बदलने लगते है. कब यह बदलाव उसके जीवन में आ जाते है यह उसे पता भी नहीं चल पाता. वो अंदाजा भी नहीं लगा सकती की कब और कैसे उसकी जिंदगी धीरे-धीरे से पूरी तरह बदल चुकी है.

महिलाओं की जिंदगी में तो यह बदलाव उसी दिन से शुरु हो जाती है जिस दिन से उसका रिश्ता किसी के साथ पक्का कर दिया जाता है. नए रिश्ते बनाने की झोंक में उसे यह पता हीं नही चल पाता कि कब वह पहले के मुकाबले बदल गई. वह इस बदलाव की शुरुवात को समझ हीं नहीं पाती है, और प्यार में वह अपना सबकुछ त्यागने को तैयार हो जाती है.

चाहे वो बदलाव पहनावे का हो, या उसकी किसी इच्छा को भूल कर आगे बढ़ने का ये सब बहुत छोटी सी चीज हो जाती है.

जींस-टॉप से सलवार कमीज और साड़ी पर कब वह आ जाती है उसे पता हीं नहीं चलता. ऐसा शायद इसलिए होता है क्योंकि ससुराल वाले शादी के बाद उससे यही उम्मीद रखते हैं. जी हां यह समाज का ऐसा बनाया हुआ नियम है, जहां शादी के बाद एक महिला से अलग पहनावे की उम्मीद रखी जाती है. ससुराव वाले इस बात का ढांढस देते हैं कि बहुएं घर की मान होती है, इसलिए उनका पहनावा बदलना चाहिए. तो क्या जब तक वह कुंवारी थी अपने मायके के मान का ख्याल नहीं रखती थी. मायके में तो उसने अपने पिता के मान को भी बखूबी बनाए रखा था, तो फिर शादी के बाद मान की बात कहां से आ जाती है. मान के नाम पर आजादी छीन जाना तो एक गलत तर्क है. आखिर बहु भी कभी किसी की बेटी थी और तब उसके पास वह सारी आजादी थी.

उसी घर में उस घर की बेटीयों को अपने मन के कपड़े पहनने की आजादी होती है. ऐसा क्यों होता है. शादी के पहले तो ससुराल वाले कहते हैं बहु को बेटी बना कर रखेंगे, तो फिर बहु बनते ही कहां चले जाते हैं वो वादे. जहां एक बेटी को फिर से बहु बना दिया जाता है. वो भी सिर्फ एक कपड़े पहनने में बदलाव की वजह से. शादी तो एक लड़के की भी होती है तो फिर उस पर ये सब बंदिशें क्यों नहीं...? उसे क्यों नहीं बोला जाता कि शादी के बाद जिंस पैन्ट ना पहनकर वह धोती कुर्ता पहने या फिर कुर्ता पायजामा पहने. उसे जो मन वो पहने, उसपर परिवार के मान का बोझ नहीं. बस परिवार के मान की सारी जिम्मेदारी अकेली एक औरत हीं क्यों उठाए.

एक महिला को सिर्फ इतना ध्यान रखना चाहिए कि पहनावा ऐसा हो कि किसी की भावनाओं को ठेस ना पहुंचे. ये ध्यान इसे मायके और ससुराल दोनों ही जगह रखना चाहिए. क्या किसी की जिम्मेदारियां उठाने, प्यार करने की कीमत यह होती है की आपसे आपकी आजादी छीन ली जाए.

शादी जैसे पवित्र रिश्ते को पहनावे के जंजीर में मत बांधिये. पहनावा हर औरत का अपना निर्णय है, उसका अधिकार है. चाहे फिर वह शादी के पहले का हो या बाद का.

यह बात और थी कि कुछ सालों पहले हमारे देश में इन बातों पर काफी ज्यादा ध्यान दिया जाता था. जो ऐसा करती थीं उन्हें मॉडर्न , पॉश या विरोधी कहा जाता था. फिर वक्त बदला और लोगों की सोच भी. लेकिन फिर भी हमें आज भी यह स्थिति देखने को मिलती है. बावजूद इसके कुछ लोग अभी भी पहले वाले सोच को प्राथमिकता देते हैं, और ऐसा नहीं करने पर कितनी ही बार महिलाओं को मान नहीं रखने के लिए कोसा भी जाता है. हैरानी की बात है ना...

 

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