Skip to content Skip to navigation

न्यूज विंग के जागरूक पाठक अपनी समस्या, अपने आस-पास हो रही अनियमितता की तस्वीर या कोई अन्य खबर फोटो के साथ वाहट्सएप नंबर - 8709221039 पर भेजे. हम उसे यहां प्रकाशित करेंगे.

मुसलमानों के लिए क्या है मुहर्रम का महत्व

Md. Asghar Khan

Ranchi, 01 October: कर्बला मुहर्रम का सूत्रधार है. इराक के मध्य में बसा हुआ कर्बला नाम का शहर आम मुसलमानों के जेहन में महज शहर नहीं, बल्कि इमाम हुसैन की शहादत का शाहिद (गवाह) है. बगदाद से 55 किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में बसा यह शहर शिया बहुल्य इलाका है. मदीना-मक्का के बाद इस्लाम की कई जानकारी इसी कर्बाला से मिलती है. इस शहर के इतिहास से ही मुहर्रम के महत्व का पता चलता है. मुहर्रम को लेकर आज भी सिया और सुन्नी मुसलमानों की अलग-अलग सोच है. क्या शियाओं के लिए मुहर्रम का अलग महत्व है? इस पर शिया धर्मगुरू और रांची के जाफरिया मस्जिद के ईमाम मौलाना सैयद तहजीबुल हसन ने अपनी राय सामने रखी है.

हर मुस्लिम इमाम हुसैन को चाहता हैः मौलाना

मौलाना सैयद तहजीबुल हसन कहते हैं कि कौन मुस्लिम है, जो इमाम हुसैन को नहीं चाहता है. वो बताते हैं कि शिया का लफ्जी माने मोती और चाहने वाला होता है. यजीद ने जब इमाम हुसैन समेत 72 साथियों को भूखा-प्यासा रखकर 10 मुहर्रम 61 हिजरी का कत्ल कर दिया, तब से ही यह प्रथा शुरु हुई. हुसैन ने अपने बड़े बेटे सैयद जैनुल आबदिन को फसिहत कर कहा था कि मदीने में मेरे चाहने वालों से मेरा जिक्र करना है. मौलाना आगे कहते हैं कि पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाती) इमाम हुसैन को पूरी दुनिया के मुसलमान चाहते हैं. जंग ए कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीद की लश्कर जश्न में डूब गई थी. तब हुसैन के परिवार समेत उनके चाहने वाले लोग गमजदा (शोक) थे. जश्न मनाने वाली लश्कर का आज कोई अनुयायी नहीं है. इसलिए मुहर्रम का महत्व दुनिया के सभी मुसलमानों के लिए एक ही है, ‘याद ए हुसैन’

यह भी पढ़ेंः मुहर्रम जुलूस में शराब पर प्रतिबंध, आग व ट्यूबलाईट के खेल पर भी रोक

कब से निकलने लगा जुलूस

मुहर्रम के जुलूस की शुरुआत इराक के कर्बला से होती है. इमाम हुसैन के शहादत के बाद कर्बला में ही सुपुर्द-ए-खाक यानी उनकी मजार शरीफ बना दी गई. फिर शहादत के दूसरे साल ही (6 हिजरी) पहली मुहर्रम पर हुसैन की याद में मजार शरीफ पर लोग जमा होने लगे. यहां पर उन्हें याद करते हुए रोया-गाया करते थे और यौम ए शहादत (दस मुहर्रम) को मातमी जुलूस निकाला जाता था. इसके बाद ही पूरी दुनिया में इस तरह के जुलूस की प्रथा शुरु हुई. मौलाना रिजवी कहतें हैं कि हिंदुस्तान में मजहब की कई विविधताएं हैं, यहां मुहर्रम के जुलूस में हिंदु भाई भी कसरत (काफी संख्या) से हिस्सा लेते हैं.

इमाम हुसैन की मजार का स्वरूप है ताजिया

मुहर्रम के जुलूस में निकलने वाला ताजिया इमाम हुसैन की मजार का स्वरुप है. अकिदतमंद लोग उनकी याद में मजार शरीफनुमा ताजिया बनाते हैं. जुलूस के साथ शहर में स्थित कर्बला तक ले जाते हैं.

यह भी पढ़ेंः शाह अस्त हुसैन, बादशाह अस्त हुसैन...(मुहर्रम पर खास)

अलम का इतिहास

अलम कहें या आज इसे निशान भी कह सकते हैं. मुहर्रम की पांचवीं तरीख से हिंदुस्तान में मुहर्रम या अखाड़े एवं समितियां जगह-जगह निशान खड़ा करते हैं, लेकिन इसका इतिहास भी इस्लाम से ही मिलता है. इस्लाम का यह झंडा पैगंबर मोहम्मद सल्ल के हाथों में हुआ करता था, जिसे मोहम्मद साहेब के दमाद हजरत अली ने जंग ए खैबर में पकड़ा था. इसके बाद उन्होंने अपने बेटे और इमाम हुसैन के सौतेले भाई अब्बास के हवाले कर दिया था. अब्बास कर्बला की लड़ाई में इस अलम को लिए शहीद हो गए.

1734 में बना कर्बला चौक का कर्बला

रांची में तब ब्रिटिश बटालियन में काफी संख्या में मुस्लिम सिपाही थे. इसमें से एक ने 1734 में इराक के कर्बला जाकर वहां की मिट्टी लाई थी. उन्होंने इस मिट्टी को रांची कर्बला चौक पर दफन किया. इसके बाद से ही मुहर्रम में यहां लोगों का जमवाड़ा लगना शुरु हुआ. 7 से 10 मुहर्रम तक यहां लोगों की काफी भीड़ रहती है. नेयाज-फतिहा होता है. दस मुहर्रम को शिया-सुन्नी के द्वारा निकाले जाने के जुलूस में लोग यहीं पर इकट्ठा होते हैं. इसके अलावा भी रांची के कांके और डोरंडा में कर्बाला है.

Share

Add new comment

loading...