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भूमि बैंक के कारण फिर सुलगने लगा है खूंटी का मुंडा अंचल

Pravin kumar

Ranchi, 14 November: खूंटी जिला का मुंडा अचंल ब्रिटिश काल से ही सराकर के जन विरोधी नीतियों के  मुखालफत  का केन्द्र रहा है. ब्रिटिश काल में वहां सरदारी आंदोलन, बिरसा आंदोलन हुए. हाल में उसी इलाके में कोयलकारो बांध के विरोध में आंदोलन, मित्तल कंपनी के खिलाफ जन आंदोलन के साथ-साथ हाल ही में सीएनटी-एसपीटी एक्ट संशोधन के विरोध में भी जबरदस्त आंदोलन चला. एक बार फिर से खूंटी का मुंडा अंचल सुलगने लगा है. लोग गोलबंद होने लगे हैं. इस बार इसकी वजह जिला प्रशासन द्वारा तैयार किया गया लैंड बैंक है. लैंड बैंक के विरोध में मुंडा अंचल के लोग सरकार के खिलाफ परंपरागत ग्राम सभा ने कमर कस ली है. आने वाला समय फिर एक बड़े जन संघर्ष की ओर यह इशारा कर रहा है. क्योंकि लैंड बैंक में जिन जमीनों को शामिल किया गया है, उसमें सरना स्थल, विद्यालय, चर्च और मंदिर की भी जमीन है. गांव-गांव में बैठकें शुरु हो गयी है और प्रशासन के खिलाफ खड़े होने की रणनीति बनायी जाने लगी है. लैंड बैंक के अधीन वैसी जमीन भी हैं, जिसका इस्तेमाल मुंडा समाज कर रहा है.

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भूमि बैंक बनाने का क्या है मकसद

झारखंड में पांच जनवरी 2016 को भूमि बैंक बनाने की शुरूआत की गई है. इस बैंक के माध्यम से राज्य सराकर राज्य में निवेश करने वाले निवेशकों को जमीन देने की बात कहती है. अब जमीन का अावंटन भी किया जाने लगा है. उल्लेखनीय बात यह है कि सरकार जिसे लैंड बैंक मानती है, वहां सामुदायिक इस्तेमाल की चीजें हैं. 

आखिर क्यों आक्रोशित है मुंडा समुदाय

लैंड बैंक में सराकर ने गैर-मजरूवा आम और खास जमीन को शामिल किया है. जिस पर ग्रामीणों का लंबे समय से कब्जा है. ग्रामीण अपनी अजीविका के लिए खेती करते आ रहे हैं. परती, सरना, चर्च, मन्दिर, भूतखेता, डाली कतारी और गांव का रास्ता भी लैड बैक में शामिल है. ग्रामीणों को यह लग रहा है कि सरकार उनकी जमीन, चर्च, मंदिर, रास्ता खत्म करना चाहती है. अगर समय रहते ग्रामीणों को जागरुक नहीं किया गया, तो इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं. 

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लैंड बैंक के विरोध में संगठित हो रहे हैं ग्रामीण

तोरपा के रेजन गुड़िया बताते हैंः हमारे इलाके में ग्राम सभा की बैठक में लैंड बैंक पर चर्चा की जा रही है. सरकार ने ग्रामीणों से पूछे बिना जमीन को भूमि बैंक में शामिल कर लिया है, जो यह गलत है. गांव में डेरगा की ही जमीन को ले लीजिये. गांव का रास्ता, परती कदीम, करोनदी को भी भूमि बैंक में शामिल कर लिया गया है. रेजन गुड़िया के मुताबिक तोरपा अंचल के डेरांग मौजा थाना न.-75, खाता संख्या-71 का कुल 80 एकड़ जमीन बैंक में शामिल  किया गया है. जो गलत है. गांव के हातु मुंडा सुलेमान गुड़िया का कहना है कि यह इलाका पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है. जिस कारण सरकार बिना ग्राम सभा के अनुमती के बगैर हमारी जमीन को लैंड बैंक में शामिल नहीं कर सकती. 

गलत कर रही है सरकार

ग्रामसभा गोपला के हातु मुंडा फलोरेनसियुस गुड़िया का कहना है : मेरे गांव के 11.74 एकड़ जमीन लैंड बैंक में शामिल किया गया है. जो कि आम रास्ता है. यह तो सरासर गलत है. सरकार हम आदिवासी मूलवासियों के साथ गलत कर रही है.

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लैंड बैंक से अलग करें चारागाह की जमीन

रोन्हें मौजा के किरण गुड़िया बताते हैं : हमारे गांव की परती जमीन जिसे हम चारागाह के रूप में इस्तेमाल करते हैं और गांव का रास्ता एवं नदी को सरकार ने लैंड बैंक में शामिल कर लिया है. अगर सरकार हमारे गांव की जमीन को लैंड बैंक से अलग नहीं करती तो इसका जबरदस्त विरोध होगा.

ग्रामसभा स्वीकृति के बिना सरकार नहीं कर सकती जमीन का उपयोग

ग्रामसभा दुमुगदिरी के ग्रामसभा सचिव लोधा भेंगरा का कहना है कि हमारे गांव की जमीन अंचल तोरपा के अंतर्गत आती है. जिसका खाता संख्या-35, प्लॉट नंबर-660, रकबा 1.77 एकड़ है. यह सरना की जमीन है. सरकार इसे भूमि बैंक में लाकर हमसे छीनना चाहती है. गांव का कुल 10.42 एकड़ जमीन लैंड बैंक में शामिल किया गया है. जिसमें सरना की जमीन, परती जमीन और नदी भी शामिल है. यह बिल्कुल गलत है, यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244 में निहित पंचायत उपबंध अनुसूचित क्षेत्र विस्तार अधिनियम 1996 की धारा 4(क), (ख), (ग), (घ) और पांचवी अनुसूची के धारा और उप धारा के अनुरूप नहीं है. किसी मौजा अर्थात गांव की भूमि बगैर ग्रामसभा की स्वीकृति के सरकार उपयोग में नहीं ला सकती.

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राज्यपाल से मिलेंगे, नहीं मिला न्याय तो वही करेंगे, जो कई पीढ़ी से करते आ रहे हैं

पिछले 60 सालों से संघर्ष कर रहे लोगों का मानना है कि सरकार अब उन्हें तोड़ने के मकसद से यह हथकंडा अपना रही है. कोयलकारो जन संगठन के विजय गुड़िया बताते हैंः लोहाजिमी मौजा का 216 .77 एकड़, डेरांग मौजा का 80 एकड़, गुटुहातु मौजा का 10.4 एकड़, कलेट मैजा का 7.75 एकड़, तपकरा मौजा का 55.11 एकड़, कोचा ग्रामसभा का 10.76 एकड़, कमड़ा मौजा 207.3 एकड़, रोन्हे ग्रामसभा का 62.54 एकड़, हुसीर ग्रामसभा का 156.85 एकड़, गुम्पू मौजा का 94 एकड़, डिबुकेल मौजा का 80 एकड़ और वरदा मौजा का 102.65 एकड़ जमीन लैंड बैंक में शामिल किया गया है. हमलोग ग्रामसभा की बैठक इस विषय पर कर रहे हैं. क्योंकि सरकार पूरी तरह गैरकानूनी तरीके से पांचवी अनुसूची के प्रावधानों का उल्लंघन कर रही है. हम लोग प्रत्येक ग्रामसभा द्वारा ऐसे भूमि को चिन्हित करने का काम कर रहे हैं. जिसे सरकार ने लैंड बैंक में शामिल किया है. इसे तैयार कर स्थिति का आकलन तैयार करके दिसंबर महीने में हम लोगों का प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल से मिलेगा. अगर राज्यपाल इसपर कार्यवाही नहीं करती हैं, तो हम लोगों के पास एक ही रास्ता बचता है, वह यह जो  हम लोग कई पीढ़ी से करते आ रहे हैं. 

तेज हो गया है बैठकों का सिलसिला

तपकरा प्रखंड के कई ग्रामसभाओं में लैंड बैंक के खिलाफ बैठकें तेज हो गई है. 10 अक्टूबर को गुड़िया पड़हा सभा की बैठक की गई थी. बैठक में विचार विमर्श किया गया कि सरकार पांचवी अनुसूची का उल्लंघन कर रही है. गुड़िया पड़हा सभा द्वारा गांव-गांव में लोगों को जागृत करने का काम किया जा रहा है. गुड़िया पड़हा राजा हवेल गुड़िया बताते हैं कि मुंडा लोग इस जमीन को साफ करके यहां पर बसाहट बसा हुए हैं. अगर सरकार हमारी इस जमीन को कंपनियों को दे देगी, तो हम क्या कहां जाएंगे. कई स्थानों पर आम गांव का रास्ता आदिवासियों का सरना स्थल यहां तक कि लोहाजिमी राजस्व गांव का भूमि जिसमें सरना, आरसी चर्च लोहाजिमी और आरसी प्राथमिक विद्यालय लोहाजिमी को भी लैंड बैंक के अंतर्गत सरकार ले आई है. यह आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति से सीधे तौर पर खिलवाड़ है. विकास के नाम पर ऐसा नहीं होने देंगे. सरकार आदिवासियों की जमीन लूटने की कोशिश कर रही है. दिसंबर महीने में हम राज्यपाल को ज्ञापन देंगे. फिर इस संबंध में आगे की रणनीति बनायेंगे.

जिले भर में फैल रही आग

जानकार बताते हैं कि लैंड बैंक के खिलाफ फिर से खूंटी जिला सुलगने लगा है. खूंटी जिले के रनिया, तोरपा, अड़की प्रखंड में लगातार ग्रामसभा की बैठक हो रही है. सरकार की नीतियों के खिलाफ आंदोलन शुरु करने की तैयारी चल रही है. आने वाले समय में लैंड बैंक एक बड़ा मुद्दा इस पूरे मुंडा क्षेत्र का बनने की आशंका है. इसी इलाके में सीएनटी एक्ट संशोधन के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन चला था. जिसके बाद सरकार को सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन से पीछे हटना पड़ा. गांव में चल रही बैठकें एक बड़े आंदोलन की सुगबुगाहट है. पांचवी अनुसूची के अंतर्गत पड़ने वाला यह इलाका पूरी तरह मुंडा आदिवासी बहुल इलाका है. इस इलाके में परंपरागत ग्रामसभा ही सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य पर निर्णय लेता रहा है. आंदोलन में भी भाग लेने के लिए मुंडा समाज अपने ग्रामसभा में ही निर्णय करता है.  ऐसे में सीएनटी आंदोलन के बाद पत्थलगड़ी का भी दौर चला ग्रामसभा के संवैधानिक प्रावधानों को गांव के सीमान पर पत्थर पर लिखा सैकड़ो गांव में दिखते है. ग्राम सभा के संवैधानिक मान्यता को लेकर स्थानीय मुंडा समाज लगातार संघर्ष कर रहे हैं. 

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