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श्राद्ध विशेष: बुजुर्गों से प्रेम करने वालों का ही होता है उनके आशीर्वाद पर हक



R D Agrawal

बुजुर्गो और पितरों के प्रति श्रद्धा ही असली श्राद्ध है. भाद्रपद की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर अश्विन मास के कृष्णपक्ष तक कुल सोलह दिनों की अवधि पितृपक्ष कहलाती है. इस समय सूर्य कन्या राशि में चला जाता है. इसीलिए इसे कन्यार्कगत या कनागत कहा जाता है. ब्रह्म पुराण के अनुसार अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में यमराज सभी पितरों को अपने यहां से स्वतंत्र कर देते हैं, ताकि वे अपनी संतान से पिंडदान लेने के लिए पृथ्वी पर आ सकें. 

स्मरणांजलि अर्पण नहीं की जाती है तो उन्हें दुख होता है

कर्मपुराण के अनुसार पितर इन दिनों पृथ्वी पर यमलोक से यह जानने के लिए आते हैं कि उनके कुल के लोग उन्हें याद भी करते हैं या नहीं. यदि श्राद्ध के माध्यम से उन्हें स्मरणांजलि अर्पण नहीं की जाती है तो उन्हें दुख होता है. श्राद्ध करनेवाले व्यक्तियों को पितर दीर्घ आयु, धन, संतान, विद्या तथा विभिन्न प्रकार के सांसारिक सुखों का आशीर्वाद देकर प्रसन्नतापूर्वक अपने लोक में वापस लौट जाते हैं.

जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नए को प्राप्त होती है

वैसे यमराज सभी पितरों को स्वतंत्र नहीं करते. गीता अध्याय दो, श्लोक 22 में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - ‘वासांसि जीर्णानि यथा विहाय, नवानि गृह्वाति नरोदयराणि.’ तथा ‘शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही.’ अर्थात जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्यागकर नए को प्राप्त होती है. नया शरीर धारण करने पर जीवात्मा नए शरीर में पृथ्वीलोक पर ही रहती है. 

जीते जी माता-पिता की अवहेलना और मृत्युपरांत श्राद्ध का औचित्य नहीं

अब के समय का जो हाल है, पूछा जा सकता है कि श्राद्ध का औचित्य क्या है/ जीते जी माता-पिता की अवहेलना, अनादर, प्रताड़ना और मृत्युपरांत श्राद्ध कर्म करना कोई मायने नहीं रखता. जिस मां-बाप ने पूरा जीवन निर्माण किया, उसी मां-बाप को वृद्धावस्था में बदहाली, गैरतभरी जिंदगी जीने को मजबूर करना क्या श्राद्ध के नाम पर ढोंग नहीं है/ अच्छा होगा कि जीते जी बुजुर्गों को वह प्रेम दें, जो उन्होंने अपने बच्चों को दिया. तब जो श्रद्धा होगी वही श्राद्ध का सही रूपक होगी. श्राद्ध से सीधा तात्पर्य है अपने पितरों को याद करना, उनके एहसानों को याद करना और जीते जी उन्हें कभी भी दुखी न करना.

 बुजुर्गों के जीवन काल में ही उनकी सेवा की जाए तभी सार्थक है श्राद्ध

आज की स्वार्थ भरी दुनिया में बुजुर्गों का आदर घटता जा रहा है. उनकी मौत के बाद उनका श्राद्ध करके यह बताने का प्रयास किया जाता है कि हम कितने पितर-भक्त हैं. यह तो श्राद्ध की तौहीन है. यदि सचमुच, तहेदिल से मां-बाप व बुजुर्गों के जीवन काल में ही उनकी सेवा की जाए, तब तो अपने मृत परिजनों को स्मरणांजलि प्रस्तुत करना श्राद्ध के माध्यम से सार्थक है. श्राद्ध का औचित्य, श्राद्ध की सार्थकता इसी में निहित है कि बुजुर्गों को जीते जी सम्मान मिले, भरपूर प्रेम से उनकी सेवा-शुश्रुषा हो, जिससे उनकी आत्मा प्रसन्न हो. तभी उनका आशीर्वाद भी लगेगा. साभार: नवभारत टाइम्स

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