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जवान होते झारखंड की ख्वाहिशों के इस पार और उस पार

Roopak Raag

17 साल में कोई नवजात बच्चा युवावस्था में प्रवेश कर जाता है. उसकी भागीदारी का दायरा सामाजिक विस्तार पाने लगता है. हमारे झारखंड राज्य की आज उम्र उतनी हो चुकी है. बरसों की मांग ने आज हकीकत की जमीन पाई. विकास का मसौदा अपने तरीके से अपने लोगों के लिए तैयार करना था, संवारना था. मुक्ति मिली थी एक ऐतिहासिक अन्याय से. आज के ही दिन आठ दशकों का संघर्ष के बाद. अब सवाल उठने लगा है कि दशकों का संघर्ष क्या महज जमीन के एक टुकड़े के लिए था.

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संकट यही है कि जिनके हाथों में नेतृत्व मिला, उन्होंने झारखंड के मुक्ति संघर्ष को बस बिहार के बीचों-बीच एक लाइन खींचने तक देखा. और उसी अनुरूप राज्य की किस्मत ढालते चले गए. भारत के मानचित्र पर सबसे अधिक खनिज संपन्न राज्य- झारखंड, सबसे अधिक गरीबी वाला राज्य- झारखंड, सबसे अधिक अराजक राज्य- झारखंड. यह अंतर्विरोध कैसा है..? जहां देश के खनिज भंडार का 40 फीसदी से भी अधिक हो, वहां 80 प्रतिशत ग्रामीण गरीबी हैं. ये परस्पर विरोधी स्थितियां कैसे संभव हैं. 17 सालों का वक्त कम नहीं होता. इतने वर्षों में क्या सरकार यह नहीं तय कर सकती कि राज्य में विकास की प्राथमिकता क्या हो. किस सेक्टर के विकास पर पहले ध्यान देना है और इसे किस तरह अंजाम दिया जा सकता है. सच तो यह है कि नेतृत्व ने कभी झारखंडी चेतना और उसकी आत्मा को समझने की कोशिश ही नहीं की. नौकरशाही को यह पता नहीं होता कि राज्य में कितनी भाषाएं हैं, कितनी जातियां हैं और यहां के लोगों की जीवनशैली क्या है और वह किस तरह के जीवन के आकांक्षी हैं.

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विकास की रूपरेखा क्या हो ताकि अधिकतम लोगों को इसका लाभ मिल सके. फिर सवाल उठता है नीतियों का. नीति का अर्थ व्यापक होता है और इसके परिणाम भी बड़े स्तर पर लोगों को प्रभावित करते हैं. झारखंड पाने के लिए दशकों का संघर्ष और जब मिला तब इसके नव निर्माण की चुनौतियां. विकास प्रक्रिया को हर क्षेत्र, हर तबके के लिए एक कसौटी पर नहीं देखा जा सकता है. तो चूक कहां है. हमारे विजन में, हमारी क्षमता में, हमारे प्रतिनिधियों में या हमारे नौकरशाहों में. इन सबमें झारखंडी समाज का बंट जाना और भी आत्मघाती साबित हो रहा है. नदियां मर गयीं, तालाब सूख गये, पहाड़ ध्वस्त हो गये, जंगल मुरझा गये, कुलांचे भरते हिरण दुर्लभ हो गये, खेत छिन रहे और बेतहाशा माइनिंग से जमीन खोखली हो गई. इन सबका परिणाम क्या हुआ. 80 फीसदी ग्रामीण गरीबी. हर साल 40 हजार लोगों का रोजी-रोटी की जुगाड़ में पलायन. सत्ता के समानांतर सत्ता स्थापित करने का सशस्त्र संघर्ष. अपने ही परिवार के लोगों की टंगी से काटकर हत्या.

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तो क्या इन दुर्दशाओं को इतिहास के पन्नों में ढूंढा नहीं जा सकता. क्या उससे सीख नहीं ली जा सकती. क्या उससे आगे की विकास की रणनीति तैयार नहीं की जा सकती. ना तो इसका कोई हाजिर जवाब मौजूद है और ना ही नेतृत्व की तरफ से इसकी कोई सकारात्मक सुगबुगाहट देखने को मिल रही है. किसी पुस्तक के बुकमार्क में विषय प्रवेश, सूची और दूसरे विशेषज्ञों की शुभकामनाओं के बाद 17 पेज में असली कहानी शुरू हो जाती है. हम यहां पर पल भर के लिए रुक सकते हैं. किताब के बुकमार्क में विषय परिचय पढ़कर रोमांचित होते हैं और आगे की यात्रा शुरू करते हैं. हमारा राज्य ऐसे कई सालगिरहों के बुकमार्क को पार कर चुका है.

झारखंडी संदर्भ में हर साल यह दिन आता है. हम रिमाइंड होते हैं. पर इस बार हमारा झारखण्ड वयस्क उम्र में प्रवेश कर रहा है. इस पल में हमें अपनी गलतियों को समझना होगा. वयस्कता का दायरा बड़ा होता है. जिम्मेदारी भी बड़ी हो जाती है. इसलिए सालगिरह के इस बुकमार्क पर ठहरकर अपनी समीक्षा जरूरी है.

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यह भी याद रखना होगा कि झारखंड की आजादी की लड़ाई महज जमीन का एक टुकड़ा हासिल करने के लिए नहीं था. अपनी प्रकृति-संस्कृति का सम्मान करते हुए सामूहिक सह-अस्तित्व और संसाधनों के न्यायपरक वितरण और उसके संभोग को केंद्र में रख विकास की दिशा तय करनी थी. सामाजिक न्याय के झारखंडी सिद्धांत व इसके इतिहास को कभी समझने की कोशिश ना वर्ष 2000 से पहले हुई और ना ही अब. स्थिति यह है कि 17 सालों की यात्रा को ना तो औद्योगिक विकास कह सकते हैं और ना ही खेती का विकास. तो फिर विकास किसका हो रहा है. राज्य में पूंजी का प्रवाह किस ओर है. इसे समझना ना तो अर्थशास्त्रियों के लिए आसान है, ना समाज शास्त्रियों के लिए और ना ही राजनीतिज्ञों के लिए.

दरअसल झारखंड के भूगोल को कभी उसके सांस्कृतिक पक्ष के साथ समझने और विकसित करने के प्रयास ही नहीं हुए. नतीजा यह हुआ कि झारखंड को प्राकृतिक संपदाओं को लूटने का जरिया भर मान लिया गया. उसी के बीच रहते हुए जो सदियों में हमारी संस्कृति और जीवन शैली ने आकार लिया, उसे अहमियत नहीं दी गयी. 17 साल पहले आज के ही दिन अपना राज्य मिला तो लगा कि यह परिपाटी  बदलेगी. संसाधनों का विकेंद्रीकरण होगा और हर वर्ग की आकांक्षाओं के नजरिए को समझा जाएगा और तरक्की की जाएगी. लेकिन झारखंड आंदोलन के जरिए जब जीत मिली तो वह केवल भौगोलिक साबित हुई. मुक्ति का दायरा सामाजिक-सांस्कृतिक और प्राकृतिक न्याय के साथ नहीं जुड़ पाया. जब दुश्मन सामने होते हैं तो उनकी पहचान छुपी नहीं होती, पर जब घुसपैठ कर लें तो आंतरिक उपनिवेश की स्थितियां पैदा होती हैं. झारखण्ड के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है. हमारे ही लोग कुछ ऐसी ताकतों के साथी बनते गए.

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दुविधा यह है कि 17 सालों में हम विकास के सही रस्ते का ही चयन नहीं कर पाए हैं. न तो खेती का विकास हो रहा और न ही उद्योगों का. बहुसंख्यक आबादी को न तो रोटी मिल रही और न ही उनके खेतों को उनके पास रहने दिया जा रहा. 10 हजार लोगों को नौकरी देने के लिए 30 हजार लोगों को उजाड़ना कहां का न्याय है. और विकास का यह कैसा मॉडल है. इसका विरोध करने के लिए झारखंडी प्रतिवादों के संकेतों को किस तरह सरकार ग्रहण करती है, सबकुछ इसी पर टिका है. अपना प्रदेश छोड़कर पलायन करने और हथियार उठाने के विकल्पों के बीच झारखंडी आवाम किसे चुने. इसी पसोपेश में उलझ गए हैं. फिर सवाल गवर्नेंस का उठता है. इसे संयमित-अनुशासित करने में अधिकतम प्रभावी भूमिका उनकी दक्षता-क्षमता पर निर्भर है. अबुआ दिशोम को चलाने वाले और इसके खेवनहारों पर जनता भरोसा ही नहीं कर पा रही. महाजनी-साहुकारी के सदियों पुराने जाल में फंस कर यह राज्य जितना नहीं तडपा था, उन पर ये 17 साल भारी पड़ गए हैं.

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इससे निकलने का रास्ता क्या है? जवाब है- प्रकृति-संस्कृति का सम्मान. यहां की संस्कृति और लोक जीवन प्रकृति के साथ सामंजस्यकारी गठबंधन पर आधारित हो. पहले भी इसे दरकिनार किया गया जो आज भी जारी है. बदलाव हर जगह हो रहे हैं, झारखण्ड भी उनसे अछूता नहीं रह सकता. फिर भी हमें कम से कम दिशा का ज्ञान और ध्यान जरूर रखना होगा कि झारखंड आन्दोलन की मंजिल क्या थी- जमीन का एक टुकड़ा हासिल करना या उसके साथ वह सबकुछ जो हमारा जीवन दर्शन रहा है. इन सवालों को झारखण्ड की दुर्गति के तौर पर समझते हुए हम अपने हठ से बदल सकते हैं राज्य की तस्वीर. 17 सालों का बुकमार्क हमसे यही अपील कर रहा है शायद.... 

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