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रांचीः धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017 पर क्या कहते हैं बिशप (देखें वीडियो)

Pravin Kumar

धर्म स्वतंत्र विधेयक 2017 राज्य में लागू होने के बाद राज्य में कई तरह के चर्चाएं और विचार सामने आए हैं. आखिर यह विधेयक जब लागू किया गया तो इसमें क्या परिवर्तन या बदलाव आएगा समाज में इस संदर्भ में ऑल चर्चित कमेटी रांची के चेयरमैन सह रांची गोस्सनर चर्च के बिशप अमृत जॉय एक्का क्या कहते हैं.

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बिशप अमृत जॉय एक्का का कहना है कि राज्य में जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर पहले से ही कानून मौजूद है. स्वतंत्र धर्म विधेयक 2017 के कानूनी प्रावधान जोड़ा गया है. जिसमें बलपूर्वक और लोभ-ललाच देकर धर्मांतरण करने का प्रतिबंध शामिल किया गया है. ऐसे में सरकार को उनपर कानून समत कार्रवाई करनी चहिए जो लोग बलपूर्वक एवं लोभ-ललाच देकर धर्म परिवर्तन करा रहे हैं चाहे वह किसी भी जाति का हो.

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जहां तक जीईएल का प्रश्न है तो इस चर्च के इतिहास को भी हमें देखना होगा. 2 नवंबर 1845 में चार पादरी को छोटानागपुर के लोगों के बीच कार्य करने को भेजा गया. उस समय इस प्रदेश में ब्रिटिश हुकूमत कार्य कर रही थी. उस समय प्रदेश में अंग्रेजों, जमींदारों, महाजनों के द्वारा जमीन-जंगल की लूट, दमन, उत्पीड़न, शोषण का केंद्र बना हुआ था आदिवासी इलाका. उसी समय गोस्सनर चर्च ने झारखंड में अपना कार्य शुरू किया.

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चर्च ने अपना पहला कार्य वैसे स्थानों पर शुरू किया जो काफी दुर्गम थे. पूरा इलाका शिक्षा से महरुम था. 1851 में रांची में गोस्सनर कलीसिया की स्थापना की साथ ही स्कूल और स्वास्थ्य सुविधा के लिए दवाखाना केन्द्र खोले गये. गोविंदपुर, बुरजू, टकरमा, हजारीबाग, लोहरदगा में भी शिक्षण और स्वास्थ्य का कार्य शुरू किया गया. पांच वर्षों तक एक भी परिवार ने ईसाई धर्म नहीं अपनाया, फिर भी चर्च इन इलाकों में कार्य करता रहा. पहला बपतिस्मा मार्था नामक एक अनाथ मुसलिम लड़की का 25 जून 1846 में हुआ. उसके बाद 26 जून 1846 को लोहरदगा के भीखु और जौनी के बेटे थोमश और बेटी मेरी का बपतिस्मा हुआ. इस प्रकार कठिन परिस्थियों में भी छोटानागपुर के लोगों का विश्वास बढ़ता गया और वो ईसाई धर्म अपनी मर्जी से स्वीकार करते गए. आज इन इलाकों में आदिवासी समुदाय एवं गैर आदिवासी समुदाय में शिक्षा का स्तर का आंकलन कर चर्च के कामों को देखा जा सकता है. हम लोगों ने कभी किसी समुदाय के साथ कोई भेद-भाव नहीं किया. चर्च का दरवाजा सभी समुदाय के लिए खुला रहता है, आज भी हम लोग यही कार्य कर रहे हैं.

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हाल के वर्षों में झारखंडी समाज जिस तरह से नशा का शिकार होता जा रहा है. यह राज्य के लिए गंभीर और दुखद है. आदिवासी इलाका नशा, डायन, पलायन जैसी समस्याओं से रूबरू हो रहा है. इन सामाजिक मुद्दों का बेहतर तरीके से हल किया जाना चाहिए, इसलिए हमलोग भी इस दिशा में कार्य कर रहे हैं. गोस्सनर चर्च के विश्वासी अगर नशापान करते हैं तो उसपर चर्च रोक लगाने का भी कार्य कर रही है. वैसे नशापान किसी भी रूप में चर्च को स्वीकार नहीं, क्योंकि इसका परिवार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. डाइन जैसे मामलों में भी हमलोग कठोर निर्णय लेते हैं. ऐसे लोगों को चिन्हित कर उन्हें चेतवनी दी जाती है फिर भी अगर वो लोग बात नहीं मानते हैं तो उन्हें चर्च से बाहर निकाल दिया जाता है. ऐसे लोगों के द्वारा ही आज चर्च पर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं. हमारे शिक्षण संस्थानों में सभी धर्म और जाति के लोग समान रूप से शिक्षा ग्रहण करते हैं. आज तक हम लोगों ने किसी के साथ कोई भेद-भाव नहीं किया है. राज्य में जहां गर्ल चाइल्ड की ट्रैफिकिंग एक बहुत बड़ी सामाजिक चुनौती हैं. उस पर भी हाल के वर्षों में गोस्सनर चर्च ने कार्य करना शुरू किया है. वैसी बच्चियों की तलाश हम लोग कर रहे हैं जो कई सालों से लापता हैं.

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धर्म स्वतंत्र विधेयक पर सरकार अपना कार्य कर रही है और वह करें. इस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन इसका रजनीतिक इस्तेमाल न हो, यह जरूर ध्यान रखा जाए. अगर हम किसी पर धर्मांतरण का आरोप लगाकर उसे परेशान करते हैं और वह ममाला झूठा निकल जाए तो उस पर क्या कार्यवाही होगी या स्पष्ट अभी तक नहीं है.

 

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