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अफसरों ने रघुवर के मंसूबों पर पानी फेरा

Surjit Singh

01 जुलाई 2015ः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में डिजिटल इंडिया सप्ताह की शुरुआत की. कहाः हर गांव में होगा इंटरनेट, हर सुविधा होगी ऑनलाइन क्योंकि अब डिजिटल बनेगा इंडिया. न हर जगह दस्तखत की टेंशन, न अस्पताल की लंबी लाइन क्योंकि अब डिजिटल बनेगा इंडिया.   

01 जुलाई 2015ः उसी कार्यक्रम में टेलीकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि डिजिटल इंडिया भारत की तस्वीर बदलने वाली योजना साबित होगी. मेक इन इंडिया के बिना डिजिटल इंडिया पूरा नहीं हो सकता.

09 सितंबर 2017ः मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा कि हमें डिजिटल झारखंड का निर्माण करना है. इसमें बैंक बढ़ चढ़कर योगदान दें. बैंक लोन से संबंधित आवेदनों को त्वरित गति से निष्पादित करें. मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट भवन में विभिन्न बैंकों के वरीय अधिकारियों के साथ हुई बैठक में बोल रहे थे.

18 सितंबर 2017ः केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि नोटबंदी की सफलता का वास्तविक पैमाना डिजिटल लेनदेन की मात्रा में बढ़ोतरी, कर दायरे का बढ़ना और उच्च मूल्य के नोटों के परिचालन में कमी आना है. 

उपर के वक्तव्यों का मतलब यह है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद सब यही चाहते हैं कि देश-राज्य का डिजिटलीकरण हो जाए. कम से कम भाषणों और सरकार की नीतियों को सही बताने के लिए तो तो यही तर्क देते हैं. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास भी यही चाहते हैं. इसलिए उन्होंंने एक लाख महिलाअों को मोबाइल देने की योजना बनायी. पर, सरकार के अफसरों ने मुख्यमंत्री रघुवर दास की महत्वकांक्षी योजना पर पानी फेर दिया है. डिजिटल इंडिया को राज्य में सफल बनाने और वर्ष 2019 में भाजपा की जीत पक्की करने के लिए जो मोबाइल फोन महिला सखी मंडलों को बांटे जा रहे हैं, वह काम ही नहीं कर रहा है. होना तो यह चाहिए था कि जैसे-जैसे यह योजना आगे बढ़ती, सरकार के प्रति महिलाओं का नजरिया बदलता जाता.  सरकार, मुख्यमंत्री रघुवर दास और भाजपा की वाहवाही होती.  लेकिन हो उल्टा रहा है. सरकार के मोबाइल सेट को लेकर महिलाएं झुंझलाने लगी हैं. कुछ गुस्से और आक्रोश में भी हैं. क्योंकि जो मोबाइल सेट दिए गए हैं, वह आउटडेटेड तो है ही उसकी क्वालिटी भी खराब है. अगर कोई खराबी आ जाए, तो कहां बनायेंगे, यह अलग समस्या है. कम से कम रांची में तो कंपनी की कोई रिपेयरिंग सेंटर नहीं है. अन्य जिलों की बात तो दूर की बात है.  ऐसे में अब महिलाएं सरकार को कोस रही हैं और सवाल उठा रही हैं कि जब सिम देना ही नहीं था, तो उन्हें क्यों मोबाइल दिया गया. वह भी इतनी खराब क्वालिटी के. एक बार चार्ज करने पर दो-तीन घंटे बाद ही बैट्री जबाव दे देता है. किसी का स्क्रिन काम नहीं करता, तो किसी का चार्जर ही काम नहीं करता.

आखिर सवाल यह उठता है कि एेसे मोबाइल खरीदे ही क्यों गए, जो काम ही न करे. अाखिर किन अफसरों के जिम्मे था मोबाइल खरीदने का काम. आखिर उसने कार्बन जैसी कंपनी से खरीदने का फैसला ही क्यों लिया.  मोबाइल के बारे में सामान्य जानकारी रखने वाला भी यह जानता है कि इस कंपनी की मोबाइल बाजार में कम ही बिकते हैं. जो मॉडल खरीदे गए हैं, वह तो करीब डेढ़ साल पहले ही बाजार से गायब हो गया है. जिस कीमत में कार्बन कंपनी की मोबाइल खरीदे गए, उस कीमत में दूसरी अच्छी, नामी-गिरामी कंपनियों की मोबाइल भी मिल सकते थे. एक सवाल यह भी है कि सरकार ने एक-दो नहीं, पुरे एक लाख मोबाइल की खरीद की है. यह बड़ी संख्या है. इतनी बड़ी संख्या में मोबाइल खरीदने पर तो अच्छी कंपनियां भी कम कीमत में बेहतर मोबाइल सेट असेंबल करके दे देती. फिर सरकार के अफसरों ने किसके प्रभाव में कार्बन कंपनी की मोबाइल खरीदी, इसका जबाव सरकार को ही ढ़ूंढना होगा.

अब यह जानिए कि यह योजना सरकार और मुख्यमंत्री रघुवर दास के लिए क्यों महत्वपूर्ण है. क्या सच में सरकार चाहती है कि गांव की महिलाएं डिजिटल दौर में पीछे ना रहे. लेन-देन मोबाइल एप के जरिए करे. या बात कुछ और है. दरअसल सत्ता पर काबिज लोगों को हमेशा यह लगता है कि महिलाओं की वोट सुरक्षित हो जाए, तो चुनाव में जीत पक्की होती है. मतलब वह व्यक्ति या पार्टी चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री बनेगा जिसे महिलाओं का ज्ययादा से ज्यादा समर्थन मिलेगा. झारखंड की भाजपा सरकार को भी यही लगता है. सरकार में एक धारणा यह भी है कि जीत उसी पार्टी की होती है, जिसे राज्य भर में 18-20 लाख वोट मिलेगा. जो 18 से 20 लाख वोटरों को खुश कर देगा. उसकी जीत पक्की. सरकार बननी पक्की. अौर मुख्यमंत्री पद भी पक्का. हालांकि एक तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बड़ी संख्या में आकाश टैबलेट और लैपटॉप बांटने के बाद भी पार्टी को हार से नहीं बचा सके. फिर भी हर सरकार महिलाओं को खुश करने के लिए कदम उठाती रहती है. इसी टार्गेट को पूरा करने के लिए झारखंड सरकार ने भी एक लाख महिलाअों को मोबाइल फोन देने का फैसला किया. इससे दो से तीन लाख वोट सुरक्षित होने की उम्मीद बढ़ जायेगी. योजना सफल होती है, तो अौर दो-चार लाख महिलाओं को मोबाइल सेट देने की योजना बनायी जायेगी. गौर करने वाली बात यह है कि अभी तक यह नहीं सार्वजनिक हुअा है कि मोबाइल से महिलाएं क्या-क्या सरकारी काम करेगी. मतलब बस मुफ्त में है, ले लो. पर अफसरों ने सरकार को जो मोबाइल फोन खरीदवा दिया, उससे सरकार की योजना पर ही पानी फिरता दिख रहा है. सरकार को यह पता लगाना होगा कि इसके लिए कौन-कौन अफसर जिम्मेदार है. क्योंकि कार्बन कंपनी का यह मोबाइल आगे चल कर सरकार के लिए जी का जंजाल ही बनेगा.

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