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बढ़ते वैवाहिक खर्च रोकने के लिए बने कानून

नमामी शंकर बिस्सा

भारतीय समाज व्यवस्था में विवाह एक महत्वपूर्ण संस्कार है लेकिन देखने में आ रहा है कि लोग सादगीपूर्ण संस्कार को अत्यधिक खर्चीला बनाते जा रहे हैं. अस्सी के दशक से पूर्व तक केवल धनी वर्ग ही शादियों में मोटी रकम खर्च करना अपनी प्रतिष्ठा समझता था. जब आर्थिक सुधारों एवं उदारवाद का युग शुरू हुआ, तो गरीब वर्ग मध्यम और मध्यम वर्ग धीरे-धीरे  उच्च मध्यम की श्रेणी में आ गया. इस आर्थिक बदलाव के साथ ही सभी सामाजिक वर्गों पर महंगी शादियां करने का दबाव बढ़ने लगा. नब्बे के दशक के बाद विवाह संस्कार, समारोह का कारोबार बना दिया गया. आज इसका वार्षिक टर्नओवर करीब एक लाख करोड़ रूपये है. इसके आयोजन में फिजूलखर्ची और दिखावा सामाजिक प्रतिष्ठा के पैमाने बन गये हैं.



इस प्रतिष्ठा के लिए ही गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार का मुखिया सभी दांव पेच अपनाता है  और भ्रष्ट आचरण के लिए मजबूर हो जाता है अथवा  ऋण के बोझ तले दबने को विवश हो जाता है. दिखावे के लिए उसे संपत्ति बेचकर या गिरवी रखकर यह खर्चा वहन करना पड़ता है. यद्यपि यह सामाजिक सुधार का मुददा है किंतु दिनों दिन बढ़ रही इसकी भयावहता देखते हुए इसकी रोकथाम के लिए दहेज विरोधी कानून की तर्ज पर ही एक सख्त कानून की आवश्यकता है. यद्यपि कानून होने पर भी दहेज लेन-देन सौ फीसदी बंद नहीं हो सका है किंतु इसके विरूद्ध कानून बनने से महिलाओं पर दबाव व उनका उत्पीड़न तो निसंदेह कम हुआ ही है. संसद और विधान सभाओं में इस मुददे पर चिंता जरूर व्यक्त की जाती है लेकिन गंभीर पहल कभी नहीं हुई है.



 वर्ष 1996 में सरोज खापर्डे और 2005 में रायापति संबाशिव राव ने भी राज्यसभा में तथा इसी वर्ष प्रेमा करियप्पा ने भी राज्यसभा में ही निजी विधेयक लाकर इस सामाजिक बुराई के विरूद्ध बिगुल बजाया. वर्ष 2011 में पीजे कुरियन तथा महेंद्र चौहान ने लोकसभा में निजी विधेयक प्रस्तुत किये. इस वर्ष 2017 के प्रारंभ में लोकसभा सांसद रंजीत रंजन ने मेरिज कंप्लसरी रजिस्ट्रेशन एंड प्रिवेंशन ऑफ वेस्टफुल एक्सपेंडिचर बिल 2016 प्रस्तुत किया. इन सभी निजी विधेयकों में शादी में होनेवाले खर्चों की अधिकतम सीमा तय करने एवं सादगी की बात पर बल दिया है. इनमें ज्यादातर लेप्स हो गये हैं. विवाहों में फिजूलखर्ची रोकने के लिए यदि सरकारें इससे सामाजिक मुददे मानकर सख्त कानून नहीं बनाती है, तो यह बुराई शीघ्र ही अभिशाप बनकर विवाह जैसे पवित्र संस्कार की जड़ों को खोखला कर देगी.

 

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