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ताजमहल को राजनीति से दूर ही रखें

मनोज कुमार

ताजमहल यानि इंडो - इस्लामिक वास्तुकला का चर्मोत्कर्ष. भारतीय वास्तु कला की खूबसूरती और अरब वास्तु कला की मजबूती के संयोजन से "इंडो इस्लामिक कला" का जन्म हुआ था, पर इस संयोजन में कई शताब्दी लगे तब कहीं जाकर सत्रहवीं शताब्दी में यह अपने चर्मोत्कर्ष को प्राप्त किया. भारतीय आर्किटेक्ट व कारीगर छत के वजन को शिफ्ट करना नहीं जानते थे और अरबी कारीगर गुम्बद मार्फत वजन को जमीन में शिफ्ट करने में माहिर थे. इसी तरह दरवाजा और खिड़की के ऊपर बीम की जगह वैकल्पिक व्यवस्था द्वारा दीवार की वजन को शिफ्ट करना उन्हें पता था. वास्तव में गुम्बद, मेहराब और मीनार - ये तीनों विशेषता अरबों की देन है, पर अरब कारीगर भवन का सौंदर्यीकरण नहीं जानते थे. ज्ञातब्य है कि इस्लाम मानव व पशु पक्षियों का चित्रांकन की अनुमति नहीं देता है. इस हुनर में भारतीय कलाकारों का जोड़ नहीं था. अतएव मजबूती और खूबसूरती के संयोजन से ही एक नवीन वास्तुकला का प्रादुर्भाव हुआ था.

ऐसा कहा जाता है कि इसकी परछाई जमीन पर नहीं बनती है और पानी में विपरीत बनती है. इसके तीन प्रवेश द्वार हैं और इन द्वारों से और दूर से देखने पर ताजमहल द्वार के एकदम निकट और कलेंडर की तरह टंगा हुआ प्रतीत होता है. और द्वार पर पहुंचने पर ताज की द्वार से वास्तविक दुरी का पता चलता है. ये द्वार भी भव्य और आकर्षक हैं. जो लाल पत्थर से निर्मित है. ताज बड़ा और बहुत उंचा चबूतरा पर सफेद संगमरमर से बना हुआ है, इसके चार मीनार हैं तथा ताज के गुम्बद की खूबसूरती का क्या कहना है. इसमें जो लिखावट है, वह भी बेजोड़ हैं और फूल पत्तियों की बनावट बेहद सुंदर हैं. इन खूबियों की वजह से ही तो इसे विश्व के सात आश्चर्य में एक आश्चर्य माना जाता है. यह प्रेम का प्रकटीकरण है, पर है तो एक मकबरा ही. यूं  तो बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज के लिए बनवाया था, पर बाद में बादशाह को भी यहीं दफनाया गया था. यह वास्तुकला का नायाब नमूना है. जिसे देखना रोमांचकारी है. यह भारत की विरासत का कोहिनूर है. हां  आज इस पर बेवजह की राजनीति हो रही है. बीजेपी के विधायक संगीत सोम ने इसको लेकर गैरजरूरी टिप्पणी किये.  राजनीति जो कराये और प्रत्युत्तर में आजम खान ने राजनीति चमकाने की गरज से और कड़ी टिप्पणी दिए. ताज को गद्दारों ने बनाया, यह गुलामी की प्रतिक व इसे तोड़ देना चाहिए. आदि, आदि. यह समाज को जोड़ने की जगह तोड़ने का काम करेगा. जिस ताज से बड़ी कमाई होती है, जो विदेशियों को आकर्षित करता है और जो भारत की पहचान भी है, उसे राजनीति में घुसेड़ने की क्या जरूरत है? अब जब यूपी के राज्यपाल और मुख्यमन्त्री अपनी वाजिब टिप्पणी दे दिए तो अब इस मुद्दे को विराम देना बेहतर. 

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