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झारखंड में खाद्य सुरक्षा कानून सिर्फ कागज पर

DEERAJ KUMAR

झारखंड में खाद्य सुरक्षा कानून का क्रियान्वयन शुरू हुए लगभग दो साल हो गए हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर सबकुछ बिना नियम-कानून के अधिकारयों की मनमर्जी से चल रहा है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत गरीब परिवार को पांच किलो अनाज प्रति व्यक्ति ( प्राथमिक परिवार)/ 35 किलो अनाज प्रति परिवार( अन्त्योदय परिवार) के लिए देना है. लेकिन हालत ऐसी बनी हुई हैं कि पूरा का पूरा गांव ही राशन से वंचित है और इस बात की जांच करना मुश्किल नहीं है.  झारखंड सरकार की ही वेबसाईट पर कई ऐसे गांव मिल जायेंगे, जहां लाभुको की सूची में परिवार की संख्या शून्य दिख रही है.

कौन परिवार है योग्य :- 

- हर वह परिवार जिसका कोइ सदस्य सरकारी नौकरी में नहीं है या आयकर नहीं देता है.

- हर वह परिवार जिसके पास पांच एकड़ से कम जमीन है.

- हर वह परिवार जिसके पास तीन पहीये वाला मोटर वाहन नहीं है.

- हर वह परिवार जिसका तीन कमरे से ज्यादा का पक्का मकान नहीं है.

- हर वह परिवार जिसके घर में फ्रीज, एयर कंडिशनर या वाशिंग मशीन या ट्रैक्टर नहीं है.

राशन कार्ड में सदस्यों का नाम जोड़ने और नए राशन कार्ड बनवाने के लिए आवेदन नहीं ले रहा विभाग 

प्रखंड के पदाधिकारी द्वारा राशन कार्ड में सदस्यों का नाम जोड़ने और नए राशन कार्ड बनाने सम्बंधित आवेदन नहीं लिया जा रहा है. आवेदकों को यह कह कर लौटा दिया जाता है कि अभी जगह खाली नहीं है या अपर लीमिट क्रॉस कर गया है.  दरअसल असल बात यह है कि सरकारी पदाधिकारियों ने अयोग्य लोगों का राशन कार्ड बना दिया है. इसलिए जब तक वे अपना राशन कार्ड जमा नहीं कर देते और उनका नाम डीलिट नहीं होगा. तब तक गरीब लोगों का न तो राशन कार्ड बनेगा न ही सदस्यों का नाम जुड़ेगा.  यह कानून का मखौल बनाने वाली बात है. जबकि खाद्य आपूर्ति विभाग द्वारा जारी नागरिक आदर्श अधिकार पत्र (सिटिजन चार्टर) के अनुसार अपेक्षित प्रमाण पत्र के साथ राशन कार्ड प्रस्तूत करने पर प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी द्वारा उसी दिन सदस्यों का नाम जोड़ देना है. और यदि सत्यापन की जरुरत हो तो सत्यापन के बाद एक सप्ताह के अन्दर राशन कार्ड में सदस्यों का नाम जोड़ देना है. नया राशन कार्ड आवेदन देने के  60 दिन के अन्दर निर्गत कर देना है.  एक तरह से “ जगह खाली नहीं होने” का बहाना भ्रष्ट अधिकारियों और बिचौलियों के लिए अनुकूल है. क्योंकि किसका राशन कार्ड निरस्त हो रहा है,  किसका राशन कार्ड बन रहा है या किस परिवार के राशन कार्ड में सदस्यों का नाम जोड़ा गया है, यह बिलकुल ही गैर पारदर्शी है.

जिला शिकायत निवारण अधिकारी को कुछ पता नहीं

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत प्रत्येक जिला के अपर समाहर्ता को जिला शिकायत निवारण अधिकारी बनाया गया है. जिला शिकायत निवारण अधिकारी को न सिर्फ राशन संबंधित शिकायते लेनी हैं. बल्कि उन्हें आंगनबाडी और मध्याहन भोजन में आ रही अनियमिताओ की भी शिकायत लेना है. पर, हालत ऐसी है कि अपर समाहर्ता भूमि अधिग्रहण, भूमि सर्वे, मुआवजा आवंटन जैसे  मामलों में ही व्यस्त रहते हैं. शिकायत लेकर जाओ तो वे अपने पद का नाम और खाद्य सुरक्षा कानून के तहत अपने दायित्वों को ही भूल जाते हैं. डीलर के खिलाफ शिकायत तो बड़ी मुश्किल से ले भी लिया जाता है. सदस्यों का नाम जोड़ने और राशन कार्ड बनवाने सम्बन्धित शिकायत के बारे में तो वे बिलकुल भी नहीं सुनना चाहते हैं.

राज्य खाद्य आयोग सिर्फ कागज़ पर

कहने को तो झारखंड में राज्य खाद्य आयोग बन गया है. लेकिन यह किसी भी तरह की कारवाई करता नजर नहीं आ रहा है. आयोग द्वारा इस अस्त-व्यस्त व्यस्था को सही करने के लिए अब तक कोइ भी पहल नही की गयी है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत "राज्य खाद्य आयोग से उम्मीद की जाती है कि वे कानून के कार्यान्वयन पर निगरानी रखें और उसका मूल्यांकन करें. राज्य सरकारों को सलाह दें और किसी की हकदारी के उल्लंघन पर सिविल कोर्ट की सभी शक्तियों के साथ  इसकी जांच करें (या तो स्वयं से या फिर शिकायत दर्ज होने पर). राज्य आयोग किसी भी मामले को आपराधिक शिकायत की तरह मजिस्ट्रेट को अग्रसारित कर सकता है". 

अधिकारियों का जन विरोधी रवैया

अंग्रेजों द्वारा छोडी गयी नौकरशाही आज भी हर जागरूक नागरिक को एक खतरे और शक की निगाह से देखती हैं. खासकर आदिवासी इलाको में गैर आदिवासी अधिकारियों का यह रवैया बेहद आहत करने वाला और आपतिजनक है. जब हाल ही में खूंटी में महिला मंडल से जुड़ी महिलाएं डीलर के खिलाफ कम राशन देने की शिकायत लेकर जिला आपूर्ति पदाधिकारी और जिला शिकायत निवारण अधिकारी के पास गयी.  तो उन्ही पर यह आरोप लगा दिया गया कि वे डीलरशीप लेना चाहती हैं. इसलिए वे शिकायत कर रही है और तो और जिला शिकायत निवारण अधिकारी ने बिलकुल एक वकील की तरह उनसे सवाल करने लगे कि डीलर का नाम क्या है और क्या वे स्वयं राशन लेने जाते हैं. जब एक महिला ने कहा कि वह स्वयं नहीं बल्कि पिताजी राशन लेने जाते हैं तो अधिकारी ने उसी पर आरोप लगा दिया कि शायद पिताजी ही राशन बेच देते हैं. एक तरह से यह  बतलाता है कि अधिकारियों के अन्दर  पूर्वाग्रह और शक कितना अन्दर तक घर किया हुआ है. और उनके लिए कितना आसान है 25 किलोमाटर पहाड़ पर स्थित गांव वालों की शिकायत को बिना जांच किये हुए खारिज कर देना.

कई तरह की परेशानियों से जूझ रहें हैं गरीब

राशन को लेकर नई नई तरह की शिकायते आ रही हैं. लाभुक और जमीनी कार्यकर्ताओं को  राशन नहीं मिलने के नए-नए कारणों का सामना करना पड़ रहा है.  बैंक खाता-आधार कार्ड और राशन कार्ड में अलग-अलग नाम होने के कारण राशन नहीं मिल पा रहा है. उदाहरण के लिए शिकायत आयी थी कि राशन कार्ड में रमसा देवी नाम है, जबकि बैंक खाता और आधार कार्ड में रमला देवी नाम है.  कुछ  और भी शिकायते हैं. जैसे कि आधार छह महीने पहले जमा कर दिया. लेकिन सीडिंग नही होने की वजह से राशन नहीं मिल रहा है. (या फिर परिवार का एक ही सदस्य राशन लेने जा पाता है). 

राशन की कटौती से परेशान हैं डीलर

राशन वितरण प्रक्रिया की गड़बड़ी की वजह से अाने वाले दिनों में हंगामा हो सकता है. क्योंकि विभाग ने डीलरों को दिए जाने वाले खाद्यान में कटौती शुरू कर दी है. खूंटी बीएसओ द्वारा बतलाया गया है कि खूंटी में इस महीने राशन में 800 क्विंटल राशन की कटौती  की गयी. कारण यह बताया जा रहा है कि बायोमेट्रिक सत्यापन नहीं होने की वजह से राशन की पर्याप्त मात्रा में उठाव नहीं हुअा है. लेकिन आवंटन काट दिया जा रहा है. आवंटन में कटौती के कारण लाभुकों  को राशन नहीं मिल पा रहा है. खबर है कि आवंटन में कटौती के कारण पूर्वी सिंहभूम के घाटशिला ब्लॉक में कई लाभुकों को जुलाई का राशन नहीं मिला. अगस्त महीने में भी 900 क्विंटल राशन का कम आवंटन किया गया है. 

ऑनलाईन व्यवस्था:  तकनीकी दमन एवं  संविधान का उललंघन

सरकार द्वारा जिस उत्साह से लगातार सबकुछ (राशन कार्ड बनवाना, राशन कार्ड में सदस्यों का नाम जोड़ना, राशन मिलना) ऑनलाईन किया जा रहा है, यह चिंताजनक है. अभी विभाग द्वारा राशन कार्ड बनवाने के लिए ऑनलाईन प्रक्रिया शुरू की गयी है. जिसके लिए आवेदक को ऑनलाईन आवेदन के प्रिंट आउट के साथ   मोबाईल नंबर एवं परिवार के मुखिया का बैंक खाता एवं परिवार के सदस्यों के आधार कार्ड की फोटोकॉपी अनिवार्य रूप से बीएसओ या एमओ के यहां जमा करना है. सवाल ये उठता है कि मोबाईल फोन/मोबाईल नंबर जैसी बाजार से प्राप्त सुविधा, जो व्यक्ति के क्रय शक्ति पर निर्भर करती है, को राशन कार्ड के कानूनी हक़ के लिए अनिवार्य करना "अवसर की समानता" के मौलिक अधिकार के खिलाफ तो नहीं है ? राशन कार्ड बनवाने की ऑनलाईन व्यस्था न सिर्फ  मौलिक अधिकार के खिलाफ है. बल्कि ब्लॉक और जिला के अधिकारियों के हाथ में आवेदन के सत्यापन का absolute power देकर ग्राम सभा के शक्तियों को भी कम करती है. ऑनलाईन सदस्यों का नाम जोड़ने की असर्मथता को लेकर भी अधिकारियों द्वारा नए नए कारण बताये जा रहे हैं. खूंटी बीएसओ का कहना है कि चूंकि ऑनलाईन आवेदन के लिए ओटीपी की जरुरत होती है. इसलिए आवेदनकर्ता को स्वयं अपना  मोबाईल लेकर ऑपरेटर के पास जाना होगा. क्योंकि ऑपरेटर अपने मोबाईल में एक बार से ज्यादा ओटीपी नहीं मंगा सकता.

आधार की आनिवार्यता के अादेश का फायदा उठा रहे हैं डीलर

झारखंड सरकार द्वारा राशन कार्ड के लिए आधार अनिवार्य करने का अादेश जारी किया गया है. लेकिन इसका फायदा डीलर उठा रहे हैं. मनिका से खबर आयी है कि अगर परिवार के किसी सदस्य का आधार सीडिंग नहीं हुआ है, तो डीलर उनके हक का राशन काट ले रहा है. भले हीं पर्ची में परिवार का पूरा राशन दिख रहा हो. सरकार का ऐसा कोइ भी आदेश नहीं है कि आधार सीडिंग नहीं होने की वजह से किसी व्यक्ति का  राशन काट लिया जाए. जितना पर्ची में राशन लिखा है उतना  देना है.

नोट : लेखन झारखंड जन अधिकार जुड़े हैं.

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