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पहले दलित और मुसलिम, अब आदिवासी ईसाई...गाय के नाम पर हत्याएं जारी

Roopak Raag



गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. बीते 3 सालों में देश के विभिन्न हिस्सों में गौ-रक्षा के नाम पर कई लोगों को मार डाला गया है. गौरक्षा दलों के निशाने पर पहले अधिकतर मुसलिम समुदाय के लोग रहते थे. लेकिन अब गाय के कारण सामाजिक हिंसा और आतंक के शिकार ईसाई धर्म के लोग भी होने लगे हैं. ताजा मामला झारखंड के गढ़वा जिला के बरकोल गांव का है. गांव में रह रहे आदिवासी परिवारों पर बैल का मांस खाने का आरोप लगाया गया. इसके बाद गांववालों ने उन आदिवासियों की जमकर पिटाई कर दी. पिटाई में घायल एक आदिवासी की मौत हो गई. घटना गढ़वा के सुदूर नक्सल इलाके में घटी थी और मामले को दबा दिया गया.

पुलिस ने हमलावर भीड़ पर तो कोई कार्रवाई नहीं की बल्कि घायलों को ही जेल में डाल दिया. गंभीर रूप से घायल रमेश मिंज की जब जेल में मौत हो गई तब जाकर पुलिस ने हमलावरों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की. जेल भेजने से पहले मेडिकल टेस्ट भी हुआ था या नहीं, यह संदिग्ध है. वरना जेल में रमेश मिंज की मौत कैसे हो गई ?

जानें घटना के बारे में : प्रतिबंधित मांस के नाम पर गढ़वा में मॉबलिंचिंग का शिकार हुआ आदिवासी

गाय के नाम पर हिंसा का बढ़ता दायरा

गौ-रक्षा के नाम पर सक्रिय संगठनों और भीड़ के निशाने पर अब तक अधिकतर मुसलमान रहते थे. मगर गढ़वा की इस दर्दनाक घटना ने साबित कर दिया कि यह हिन्दू राष्ट्रवाद के नारे का ही उग्र नतीजा है. एक ऐसे भारत का गठन जिसमें हिन्दू धर्म को छोड़ अन्य संप्रदायों के लिए जगह न हो. या हो भी तो उनकी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तरों पर भागीदारी और अधिकार सीमित हो. भारत के धर्म-निरपेक्षीय संवैधानिक ढांचे में इन धार्मिक आक्रमणों को जगह नहीं दी गई है. अतः भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की मांग करने वाले संगठनों द्वारा अल्पसंख्यकों को सामाजिक रूप से डराने की मुहिम की ही यह अगली कड़ी लगती है.

मुस्लिम के बाद अब आदिवासी ईसाई

गढ़वा में जो गरीब आदिवासी गौ-रक्षा प्रेरित हिंसा के शिकार हुए वे ईसाई धर्म को माननेवाले थे. मांस आदिवासियों के खानपान का हिस्सा ऐतिहासिक रूप से रहा है. घटनास्थल से मिली जानकारी के अनुसार स्वघोषित गौ-रक्षकों ने इस हिंसा को पूरी प्लानिंग के साथ अंजाम दिया था. हजार रुपये में पहले बूढ़े बैल को बेचा गया. उसके बाद गो-वंशीय मवेशी की हत्या कर खाने के आरोप में गांव के आदिवासी परिवारों को मारापीटा गया और जख्मी हालत में पुलिस के हवाले कर दिया. इससे यह बात भी साबित होती है कि गौ-आतंक संगठित रूप से योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है.

साथी पत्रकार अक्षय गढ़वा की दुखद घटना को पढ़ते हुए बोल रहे थे कि इस घटना से लगता है कि गौरक्षा कोई धार्मिक मामला नहीं बल्कि संगठित अपराध और उन्माद है जिसके निशाने पर एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग है. यह सामाजिक-आर्थिक वर्ग हिन्दू धर्म की शुद्धता आधारित संरचना में ऐतिहासिक अत्याचारों का गवाह भी रहा है.

बेचने वाला भी धार्मिक अपराधी

बूढ़े और बेकार हो चूके मवेशियों को बेचने और काटकर खाने की परंपरा कोई नई नहीं है. हर पशुपालक चाहे वो किसी भी धर्म का क्यों न हो बूढ़े और बेकार मवेशियों का बेवजह खर्च नहीं उठाता. वह उसे बेचता ही है जिसके एवज में कुछ पैसे आ जाते हैं. यह हमेशा से चला आ रहा है. किसी भी हिन्दू पशुपालक से इसकी पुष्टि की जा सकती है. लेकिन गौ-वंश की रक्षा के नाम पर हिंसा का निशाना अल्पसंख्यक और दलित ही हो रहे. काटने, मारने या खाने से पहले गो-वंश के ये मवेशी कहां से और कैसे उन लोगों तक पहुचते हैं जिसमें गौवंश का मांस खाना वर्जित नहीं है. क्या यह बात गौ-रक्षक नहीं जानते. तो यह पूरी पक्रिया वहीं से शुरु हो जाती है जब कोई अपने बूढ़े-बेकार मवेशियों को कसाइयों के हाथों बेचता है. धर्म की प्रचंड आस्था के बीच कोई भी हिन्दू अपने पूज्य गौवंशीय मवेशियों को अगर बेचता है तो यह सबसे पहले उसका धार्मिक अपराध है.

झारखंड में लगातार हो रहे हमले

इसी साल जून में रामगढ़ में 45 वर्षीय अलीमुद्दीन असगर अली की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी. उन पर बीफ के व्यापार का आरोप लगाया गया और 100 से अधिक लोगों की भीड़ ने हमलाकर अलीमुद्दीन को मार डाला. एक और घटना जून माह में गिरिडीह जिले में घटी. गौ-रक्षकों की भीड़ ने एक डेयरी मालिक मुसलिम बुजूर्ग पर हमला बोल दिया और घर में आग लगा दी. पुलिस ने हस्तक्षेप कर किसी तरह उस्मान अंसारी और उनके परिवार की जान बचाई थी. भीड़ इतनी आक्रोशित थी कि 50 से अधिक पुलिस भी घायल हो गए थे. इसी तरह पिछले साल मार्च महीने में लातेहार के बालूमाथ में भी दो मुसलिम समुदाय के लोगों की गौरक्षकों ने हत्या कर दी गई थी. जान से मारने के बाद उनकी लाशों को अमानवीय तरीके से पेड़ से लटका दिया गया था. इनमें 15 साल का एक किशोर इम्तियाज भी शामिल था.

बकरीद पर सरकार का विज्ञापन

बकरीद के समय लगभग सभी बड़े अखबारों में झारखंड सरकार ने कुर्बानी को लेकर साफ दिशा-निर्देश जारी किये. गौ-हत्या प्रतिषेध कानून का हवाला देते हुए गौवंश और उंट की कुर्बानी पर रोक लगा दिया. गोवंश के साथ ही उसमें आदि शब्द भी जोड़ दिया गया. आदि शब्द से मुसलिम समुदाय खौफजदा हो गए कि पता नहीं इन ‘आदि’ की परिधि में और कौन-कौन से मवेशी शामिल हैं. राज्य सरकार ने योगी के नक्शे-कदम पर बूचड़खानों को पहले ही बंद करवा रखा है.

झारखंड जैसे राज्य में खानपान में मांसों की मौजूदगी केवल स्वाद का मामला नहीं बल्कि संस्कृति से भी जुड़ा सवाल है. आदिम जीवनशैली में इसकी बहुत अहमियत है. यह उनके आमदनी का भी अहम जरिया रहा है. गढ़वा में ईसाइयों पर गौ-वंश हत्या के नाम पर संगठित हमला और बालूमाथ व रामगढ में मुसलमानों की हत्या, दोनों का राजनीतिक संदर्भ भी देखना होगा. जब राज्य सरकार अपने फरमानों से समाज के फूड हैविट को नियंत्रित करने की कोशिश करे तो इसमें सत्ता के हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता है. यह फूड हैबिट नया नहीं है बल्कि यह जानलेवा उन्माद नया है. इस उन्माद ने केन्द्र और राज्य में नई सरकार आने के बाद गति पकड़ी है.

आदिवासी समाज और गो-वंश

जब आस्था का सवाल उठता है तो क्या इसका संबंध केवल बहुसंख्यकों या प्रभावकारी तबके और संप्रदाय तक सीमित होता है. अगर गो-वंश हिन्दू धर्म में पूजनीय है तो झारखंड के आधिकतर आदिवासी समुदायों के ईस्ट-देवता या टोटम जीव-जंतु ही हैं. क्या हम हिन्दू इन आदिवासियों की आस्था का सम्मान कर ऐसे जीव-जंतुओं को मारकर खाना बंद कर सकते हैं जो इनके किलीयों में पूजनीय हैं.

कच्छप यानी कछुआ किली के झारखंडी आदिवासी कछुए का मांस नहीं खाते. ये उनकी पूजा करत हैं. सांगा यानी शकरकंद. सांगा लोग शकरकंद नहीं खाते. इसके अलावे बा, मुचू, आइंद, डुंगडूंग किली के आदिवासी जिस जलीय जीव को अपना ईस्ट-देव मानते हैं वे अपने सरनेम वाले जीवों को नहीं खाते. मुण्डाओं की एक किली हंस है जो हंस को नहीं खाते, उनकी पूजा करते हैं.

इसी तरह आदिवासी समुदाय प्रकृति के किसी खास तत्व को अपने किली में सर्वोच्च स्थान देते हैं. उनकी पूजा करते हैं और उन्हें हानि नहीं पहुंचाते. मैं आदिवासियों की ऐसी दर्जनों किली गिना सकता हूं जो पेड़-पौधों और खास जीव-जंतुओं की पूजा करते हैं. जैसे कोई खास आदिवासी समुदाय अपने किली सूचक मछली को न ही मार सकता है और न ही खा सकता. पर क्या वे दूसरे को ऐसा करने से रोक सकते हैं?

कछुआ रक्षा दल, मछली रक्षा दल, हंस रक्षा दल आदि

तो क्या धार्मिक आस्था का सवाल भी वर्गीय सवाल है. सक्षम और शक्तिशाली वर्ग की आस्था का सम्मान हर कोई करे मगर कमजोर, कम संख्यावाले समुदायों की आस्था का सम्मान कोई महत्व नहीं रखता है क्या. क्या आदिवासियों की भीड़ उनके किली की मछली खानेवाले हिन्दुओं की पीटकर हत्या कर सकती है. क्या अपने किली के प्रतीक पक्षी का मांस खाने पर कोई भी आदिवासी समुदाय हिन्दुओं के प्रति उन्मादी होता है. या अपने किली के पूज्यनीय पेड़ों को काटे जाने पर कोई आदिवासी आक्रामक होता है. अगर ऐसा होता तो हर तरफ पशु-पक्षी और पेड़-पौधों के रक्षा दल हिंसक रूप से अपने-अपने किली के पूज्य प्रतीकों की रक्षा करते नजर आते. कछुआ रक्षा दल, मछली रक्षा दल, हंस रक्षा दल, सखुआ रक्षा दल, मुर्गा रक्षा दल, कटहल-आम रक्षा दल वगैरह-वगैरह.

आदिम जीचनशैली के कारण ही संविधान में इन जातियों को अनुसुचित किया गया है. किसी भी समाज का फूड हैबिट उसके निवासक्षेत्र की भौगोलिक स्थितियों और अलग-अलग कालखंडों में भोजन तलाशने और पेट भरने के संघर्षों के बीच आकार लेता है. दुनिया के किसी भी हिस्से में मौजूद आदिवासियों का जीवन कठिन परिस्थितियों के बीच होता है. मुख्यधारा समाज के विपरीत उनके पास खानपान के विकल्प भी अधिक नहीं होते.

आदिवासी समाज और सरकार के बीच दूरी

झारखंड में हाल में ही सरकार ने धर्म परिवर्तन निषेध बिल को विधानसभा से पास किया है. इसका मकसद सीधे तौर पर ईसाई धर्म अपना रहे आदिवासियों को धर्मान्तरण से रोकना है. इसके अलावे गैर-ईसाई आदिवासी जो सरना या आदि धर्म को मानते हैं, उनके हिन्दू धर्म में विलयन की राजनीतिक कोशिशें भी कुछ सालों से तेज हुई हैं. सरना-सनातन नामी संगठन हालिया दिनों में सक्रिय हुए हैं. लेकिन मूर्तिपूजक वर्ण आधारित हिन्दू धर्म में आदिवासियों का स्थान बनाये नहीं बन सकता. एक तरफ अलग सरना धर्म कोड की मांग को अस्वीकार करना और दूसरी तरफ धर्म परिवर्तन निषेध कानून बनाना सरकार की पक्षपात धार्मिक नीति को साबित करता है.

एक तरफ आदिवासियों की भूमि संरक्षा कानूनों में बदलाव को लेकर आदिवासी समाज सीएम के प्रति नफरत से भरा हुआ है वहीं दूसरी ओर रघुवर सरकार की कट्टर धार्मिक नीतियों को गैर-आदिवासी समाज में व्यापक समर्थन हासिल है. सीएनटी-एसपीटी एक्ट में संशोधन बिल को वापस कराने में चर्च ने महत्वपूर्ण गोलबंदी की थी. इसकी तीव्र प्रतिक्रिया धर्म परिवर्तन निषेध बिल के जरिये सरकार ने दी. भाजपा को समर्थन देने वाले धार्मिक संगठन गांव स्तर तक सक्रिय हैं. ऐसे में गढ़वा की घटना को सरकार के धर्मान्तरण, गौवंश हत्या प्रतिषेध और भूमि कानूनों में बदलाव के एजेंडे के विस्तार के रूप में भी देखा जा सकता है.

मध्ययुगीन बर्बरता, भूख और धर्म का अफीम

पिछले कुछ समय से झारखंड में मॉब-लिंचिंग की घटनाओं ने मध्ययुगीन बर्बरता को भी पछाड़ दिया है. अफवाह या छोटी-मोटी गलतियों पर भी भीड़ द्वारा लोगों को पीट-पीटकर हत्या कर दी जा रही. सामाजिक गुस्से की ऐसी हिंसक अभिव्यक्ति एक असंतुष्ट समाज में ही होती है. झारखंड की चैतरफा बदहाली और सामाजिक घुटन की भी यह उग्र बयानगी है. भूखी जनता को जब रोटी के बदले धर्म का अहीम खिला दिया जाता है तब वह भूख को भूल नशे का उन्मादी हो जाता है. झारखंड जैसे देश  के सबसे गरीब राज्य में सत्ता की नाकामी को छुपाने का इससे बेहतरीन तरीका और क्या हो सकता है. और जब ऊपर से भी ऐसी हरकतों और एजेंडों को वाहवाही मिले तो राज्य सरकार को कुछ भी कर देने का अभय मिलता है.

दम तोड़ते मासूम, सड़क पर बच्चे जानतीं महिलायें और मवेशी रक्षा दल

पिछले महीने झारखंड में ईलाज के अभाव में करीब दो सौ बच्चों की मौत हुई. मानव तस्कर झारखंडी लड़कियों को भेड़-बकरी से भी कम दामों में खरीदते-बेचते हैं. भूख से मौत की खबरें आती रहती हैं. ऐसे में गाय-बैल और माल-मवेशियों का राजनीतिक एजेंडे में सबसे ऊपर होना, लोकतंत्र के तंग-तबाह होने की निशानी है. 

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