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सरिया थाने में विस्फोट के बाद जांच में पता चला कि नक्सल प्रभावित नवनिर्मित थानों के कैंपस में दबा है अनगिनत लैंडमाइंस और विस्फोटक

NEWS WING

Ranchi, 22 November: पुलिस विभाग की चूक और लापरवाही की वजह से गिरिडीह के सरिया थाना में जो भी हुआ, वो एक छोटा उदाहरण माना जा रहा है. झारखंड के 24 में से 18 जिले नक्सल प्रभावित हैं. ऐसे में किसी भी नक्सल प्रभावित जिले के थाने से एक जोरदार विस्फोट की खबर कभी भी आ सकती है. ये विस्फोट और कोई नहीं बल्कि खुद पुलिस की गलती से होगा. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि नक्सल प्रभावित जो भी इलाके हैं, उन इलाकों के थानों के परिसरों में या फिर आस-पास बड़े पैमाने में लैंड माइंस और विस्फोटक जमीन के अंदर दबा हुआ है. जो या तो किसी वजह से गर्म होने के बाद फट सकता है, या फिर किसी वजन के बोझ तले. 

छह सालों तक पुलिस ने विस्फोटकों को थाना परिसर में दबाने का काम किया

झारखंड नक्सली दंश दशकों से झेल रहा है. जिस स्तर पर नक्सलियों ने झारखंड को तबाह करने की तैयारी की, उस तरीके से पुलिस ने उनसे बचने की नहीं की. साल 2000-2006 के बीच झारखंड के पास किसी तरह का कोई भी बम स्क्वॉइड (बम निरोधक दस्ता) ही नहीं था. ऐसे में राज्य भर में पुलिस को जब भी नक्सलियों पर कार्रवाई में सफलता मिलती, तो उनसे बरामद लैंड माइंस और विस्फोटक पुलिस डिफ्यूज करने के बजाय थाना परिसरों या आस-पास इलाकों में दबा कर रख देती. गिरिडीह में जो विस्फोट हुआ वो भी इसी पीरियड में दबाया गया सिलेंडर बम और दूसरे विस्फोटक थे.

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दस्ता बनने के बाद भी पुलिस ने नहीं की कोई कार्रवाई

सबसे चौकाने वाली बात यह है कि जब 2006 के बाद बम स्क्वॉइड टीम बनी, तो पुलिस प्रशासन की तरफ से नक्सलियों से जब्त लैंड माइंस और विस्फोटक जो थाना परिसरों में दबाए गए थे, उन्हें डिफ्यूज करने की कोई कार्रवाई अब तक नहीं की गयी. ना ही किसी तरह की कोई जांच कमेटी बनायी गयी, जो थाना परिसरों में दबाए गए विस्फटकों को तलाशती और उन्हें डिफ्यूज करती. ऐसे में पुलिस संबंधी मामलों के जानकारों का कहना है कि नक्सल प्रभावित जिलों के थानों में किसी भी दिन कोई बड़ी विस्फोट की घटना घट सकती है.

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थानों में मालखानों में रखा है जिलेटीन के साथ डेटोनेटर   

डेटोनेटर जब भी जिलेटीन के संपर्क में आता है तो उसमें विस्फोट होना तय है. साथ ही जब भी वो अधिक तापमान या दबाव में आता है तो भी विस्फोट की पूरी संभावना रहती है. पुलिस कायदों की अगर बात करें तो दोनों (डेटोनेटर और जिलेटीन) को हमेशा अलग-अलग रखना होता है. लेकिन नक्सल प्रभावित झारखंड के कई थानों के मालखानों में ये दोनों विस्फोटक सामग्री एक साथ रखे हुए हैं. ऐसे में बड़ा विस्फोट थाना परिसर में कभी भी हो सकता है.  

सरिया थाना में विस्फोट के बाद अब हो रहा है खुलासा

गिरिडीड जिले के सरिया थाना में हुए विस्फोट के बाद अब जांच कमेटी कई तरह के खुलासे कर रही है. विस्फोटक डिफ्यूज करने के लिए पुलिस ने एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिड्योर) बनायी है. लेकिन सरिया में उस एसओपी का पालन नहीं किया गया. एसओपी के तहत पहले किसी सुनसान इलाके का चयन करना होता है. आस-पास के इलाकों में इस बाबत पूरी जानकारी देनी होती है. फिर तय समय पर इलाके की झंडे लगाकर घेराबंदी कर पूरी सावधानी और बम निरोधक जैकेट आदि पहन कर बम को डिफ्यूज करना होता है. जो कि सरिया थाना मामले में नहीं किया गया. सारे नियम और कानून को ताक पर रखते हुए थाना परिसर में ही जिलेटीन को डिफ्यूज करने की कोशिश की गयी, नतीजा विस्फोट और दो मौत.     

खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता, हर थानों की जांच होनी चाहिएः देव बिहारी शर्मा (डायरेक्टर, झारखंड पुलिस अकादमी)

किसी भी खतरे से इनकार नहीं किया सकता. जब तक जांच नहीं होती है. झारखंड बनने के बाद पुलिस के पास उस तरह की सुविधाएं काफी कम थीं. जब भी कोई बम या फिर विस्फोटक मिलता, तो हमें सीआरपीएफ या फिर बाहर के  बम निरोधक दस्ता का इंतजार करना पड़ता था. पुलिस को ट्रेंड नहीं किया गया था. पुलिस को बम कैसे हैंडल करना है. इस बात की जानकारी नहीं थी. 2006 के बाद पीटीसी (पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज, हजारीबाग) में बम निरोधक दस्ता बना जो सबसे प्रशिक्षित और उन्नत तकनीक से लैस है. जरूरत है नक्सल प्रभावित थाना परिसरों की जांच हो.   

 

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