लुप्त होती झारखंड की जादोपटिया चित्रशैली
:: मौमिता ::
“.. ’जादोपटिया चित्रकला शैली‘ झारखंड-बिहार की सीमा पर सदियों निवास करती आ रहे संताल जनजाति की वह लोकशैली है जो इस समाज के इतिहास और दर्शन को पूर्णतः अभिव्यक्त करने की क्षमता रखती है. यह संताली समाज से जुडी प्राचीन चित्रकला है, जो इस समाज के उद्भव विकास, रहन-सहन, धार्मिक विश्वास एवं नैतिकता को व्यक्त करती है. ..”
लोक कला मानव सभ्यता का एक अभिन्न अंग है. यह संवेदना और भावुकता का वह मिश्रण है जो समाज को जोडने में मदद करता है. लोक कला समाज के उन पुरातन रीति-रिवाजों पर आधारित है जिनका मकसद समाज में प्यार और भाईचारे को बढाना है. लेकिन ये लोककलायें संरक्षण के अभाव में लुप्त हो रही है. लुप्त होती इन कलाओं में जादोपटिया चित्रकला का नाम भी शामिल है.
’जादोपटिया चित्रकला शैली‘ झारखंड-बिहार की सीमा पर सदियों निवास करती आ रहे संताल जनजाति की वह लोकशैली है जो इस समाज के इतिहास और दर्शन को पूर्णतः अभिव्यक्त करने की क्षमता रखती है. यह संताली समाज से जुडी प्राचीन चित्रकला है, जो इस समाज के उद्भव विकास, रहन-सहन, धार्मिक विश्वास एवं नैतिकता को व्यक्त करती है. इस शैली के कलाकार वंश परम्परा के आधार पर इस कला को अपनाते आए हैं . इनके नाम के साथ जादोपटिया शब्द जुडा रहता है. जादो संतालों म पुरोहितों को कहा जाता था. वे इस चित्रकला के सहारे अपनी जीविका चलाते थे. वे इस चित्रकला को लेकर गांव -गांव म घूमते थे और इसे दिखाते समय लयबद्ध स्वर में चित्रित विषय और कथा को गीत के रूप में लोगों के सामने रखते थे. जिससे संताली अपनी सस्कृति के बारे जान सके. अपनी इस संगीतमय प्रस्तुति के बाद वे लोगों से दक्षिणा लेते थे. चित्रकला की इस शैली को कपडे या कागज पर बनाया जाता है. कपडे पर सूई-धागा से सी कर ५ से २० फीट लंबा और डेढ या दो फीट चौडा पट तैयार किया जाता है. इसम ज्यादातर वैसे चित्रों का चयन किया जाता है जो इस समाज के सांस्कृतिक,नैतिक दृश्यो को दिखा सकें.
इस शैली के कलाकार विष्णु जादोपटिया बताते हैं कि इस चित्रकला के विषय ज्यादातर ’राम विनती‘ अर्थात संतालों की उत्पति की कथा, राजा और सैनिक, कृष्णलीला आदि कथाओं पर आधारित होते है. वे बताते हैं कि ’राम विनती‘ सबसे लंबा पटचित्र है जिसमें ’मारांड बुरू (शिव) और ’जाहेर ऐरा‘ (पार्वती) ने किस प्रकार ’हंस-हंसिन‘ को बनाया और उसके अंडे से ’पिलचूम हाडाम‘ और पिलचू वूढा‘ (संतालों के आदि दम्पति) का कैसे जन्म हुआ तथा किस प्रकार उनके सात बेटों और आठ बेटियों ने इस संताली समाज की स्थापना की इसका विवरण इसमें मिलता है. मर्त्यलोक में मनुष्य के बुरे कामों के लिए यमलोक में यम उसे किस प्रकार दंडित करता है ऐसे काल्पनिक चित्रों को भी इस शैली में स्थान दिया गया है. इस शैली में जिन रंगों का चयन किया गया है वे ज्यादातर प्राकृतिक रंग है और इस लोक कला के चित्र बनाने में अधिकतरं लाल, भूरा, पीला एवं हरे रंग का अधिक इस्तेमाल किया जाता है. हल्दी से पीला, हरे पत्ते से हरा रंग, मुनगा की लकडी से लाल रंग, पत्थरों को पीस कर भूरा-रंग एवं कालिख से काला रंग लिया जाता है.
विष्णु जी बताते हैं कि वैसे तो इस कला का मकसद अपनी संस्कृतिक धरोहर को आगे की पीढीयों तक पहुंचाना था. लेकिन इस शैली के कलाकारों ने केवल इतना ही नहीं किया, उन्होने अपनी कला के माध्यम से इस समाज को सुधारने का भी प्रयास किया. लेकिन धीरे- धीरे समय में बदलाव आया और इस कला की लोकप्रियता घटती गई. कलाकार भी अपनी रोजी-रोटी की जुगाड में अन्य व्यवसाय की ओर अभिमुख हो गये और इस कला से उनकी दूरी बढती गयी. वहीं एक दूसरे कलाकार किशुन जादोपटिया का कहना है कि कुछ गिने चुने संताली है जो आज भी इस कला को बचाने की कोशिश कर रहें हैं पर हमारे आार्थिक स्थिति हमारा साथ नहीं देती. आज प्रदर्शनी का युग है ऐसे में हम बिना सहायता के इसे प्रदर्शित करने में विफल हो रहें है. नेपाल, तिब्बत, गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों की प्राचीन पटचित्रकला की तरह ही इस जादोपटिया चित्रकला ने भी एक समय ंअपनी खास पहचान बनाई थी. पर आदिवासी समाज के सांस्कृतिक धरोहर के रूप में लम्बी दूरी तय करने के बाद आज यह कला संरक्षण के अभाव में लुप्त होती जा रही है. बहरहाल इस बहुमूल्य, प्राचीन सांस्कृतिक दर्शन से परिचित कराने वाली चित्रकला शैली को बचाने एवं उसे संरक्षण देने की आवश्यकता है इसके बिना संताल संस्कृति की जानकारियों से आने वाली पीढी महरूम रह जायेगी. (संवाद मंथन)
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