- Sat, 31 Jul, 2010, 2:25 am -

Update@Fri, 30 Jul, 2010, 4 years ago, at the end of December

शिक्षा के ज्योत से महरूम है बीडी मजदूरों की बेटियां

..बेटी अगर पढ लिख जायेगी तो उसकी शादी के लिये लडका खोजना मुष्किल हो जायेगा. और अगर लडका मिलेगा तो भी तिलक की मांग होने लगेगी. इसी इलाके की रहने वाली पंद्रह वर्शीय सुनिता को पढने का बहुत मन था. पर उसके माता- पिता ने उसे यही कहते हुये पढने नहीं दिया कि पढ-लिख लोगी तो शादी नहीं कर पायेंगे. ….

गरीबी एक अभिशाप है और इसी अभिशाप की मार पीढयों से झेलते आ रहे हैं पलामू, गढवा और लातेहार के बीडी व्यवसाय में काम करते मजदूर और उनके परिवार. इस व्यवसाय में लगे परिवारों के बच्चे कब बडे होते हैं उन्हें पता ही नहीं लगता. पढने-लिखने का इनकी ख्वाब इनके आंखों में ही रह जाता है. खासकर लडकियों में षिक्षा का स्तर इन इलाकों में आज भी बहुत कम है.

पिछले दिनों क्राई एवं संवाद द्वारा पलामू और गढवा जिले के कई इलाकों में बीडी बनाने वाले मजदूरों पर एक सर्वेक्षण किया गया. जिसमें पाया गया कि इन इलाकों में बीडी बनाने का काम ज्यादातर दलित करते हैं. उनकी आर्थिक हालत इतनी खराब है कि वे अपने बच्चों को स्कूलों में पढने तक नहीं भेज पाते हैं. जिसके कारण यहां के ज्यादातर बच्चे अषिक्षित है. कुछ अगर स्कूल गये भी हैं तो दसवीं की पढाई पूरी नहीं कर पाये हैं.

दसवीं की पढाई पूरी करने वाले बच्चों को उंगलियों में गिना जा सकता है. पलामू के चैनपुर इलाके में कुल २५ परिवार बीडी बनाने का काम करते है. पर यहां येसा कोई भी नहीं जो कालेज तक कि पढाई पूरी किया हो. जहां तक इस व्यवसाय में लगे परिवारों की बच्चियों के पढाई का सवाल है स्थिति और भी निराषाजनक है.

पलामू, गढवा और लातेहार में इन तीनों जगहों में यह पाया गया कि बीडी व्यवसाय में लगी बच्चियां स्कूल नहीं जाती. कुछ अगर जाती भी है तो मिडिल के बाद की पढाई पूरी नहीं कर पाती. इनके नहीं पढने के पीछे या तो इनके परिवार की अनिच्छा होती है या फिर आर्थिक संकट. कुछ जगहों में तो स्कूल की दूरियां भी बच्चियों के नहीं पढाने का कारण बनती है. कारण चाहे जो भी हो सच तो यही है कि इन क्षेत्रों की बच्चियां आज भी पढने-लिखने के अपने अधिकार से महरूम है.

इन घरों की बच्चियों को बचपन से ही बीडी बनाने के कार्य में लगाया जाता है. यह माना जाता है कि बच्च की अपेक्षा बच्चियां इस काम को ज्यादा अच्छी तरह कर सकती है. बीडी का पत्ता काटने से लेकर उसमें जर्दा भर कर मुंह को बारीकी से बंद कर उसे अंतिम रूप देने का का काम लडकियां बडी कुषलता से कर लेती है. यही वजह है कि उन्हें स्कूल न भेज कर घर पर ही बीडी बनाना सिखाया जाता है. इन बच्चियों के माता-पिता का यह भी मानना है कि बेटी अगर पढ लिख जायेगी तो उसकी षादी के लिये लडका खोजना मुष्किल हो जायेगा. और अगर लडका मिलेगा तो भी तिलक की मांग होने लगेगी.

इसी इलाके की रहने वाली पंद्रह वर्शीय सुनिता को पढने का बहुत मन था. पर उसके माता- पिता ने उसे यही कहते हुये पढने नहीं दिया कि पढ -लिख लोगी तो षादी नहीं कर पायेंगे. सुनीता के माता- पिता बीडी मजदूर थे. कुछ सालों पहले उनकी मौत हो गई. तब से अपने और अपने छोटे भाइयों का पेट चलाने के लिये सुनीता ने भी बीडी बनाना षुरू कर दिया. उससे पूछने पर अपनी किस्मत को कोसते हुये वह कहती है कि न मेरी इच्छा पूरी हुई न मेरे माता पिता की. अब तो पूरी जिंदगी इस बीडी के काम मे ही झोंकना पडेगा.

दुमका के चोरखेदा गांव की विनीता की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की है वह स्कूल तो जाती है पर केवल दोपहर में मिलने वाले खाने की लालच में. उसका पूरा समय बीडी के पत्तों को लाने, काटने व उसमें तंबाकू भरने में ही बीत जाता है. अगर इन बीडी मजदूरों के लिये जल्द ही कुछ न किया गया तो इनके मासूम बच्चे पीढी दर पीढी बीडी मजदूर में तब्दील होते चले जायगे.
- गणेश रवि
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