जेंडर बजटिंग के प्रावधान एम. पी. फंड में भी हो
|| वासवी किड़ो, नई दिल्ली से ||
नई दिल्ली: 4 फरवरी । राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रम के दूसरे दिन महिला सांसदों और यूनीफेम की साउथ एशिया की निदेशक सुश्री एनी एफ स्टेनहमर ने भाग लिया.सुश्री एनी ने कहा कि यूनीफेम को सिविल सोसायटी की ओर ध्यान देना है. बीजिंग 15 की बैठक में सरकार और हमारे स्वर एक जैसा होना चाहिए. सम्मेलन में नागरिक संगठनों की भागीदारी होनी चाहिए. सिविल सोसायटी के साथ यू. एन. का अच्छा तालमेल नहीं है. समाज परिवार में हम कहां है. प्रधानमंत्री, राष्ट्पति और सांसदों के साथ के वायदों पर भी बात होनी चाहिए. उनकी महतवपूर्ण भूमिका होगी न्यूयोर्क में. उन्हें हमारे फोकल प्वांइट को समर्थन करना होगा. चार एजेंसी यू. एन. के हैं, यूनीफेम, डिवीजन फार एडवांसमेंट आॅफ वुमेन रिसोर्स आदि को गुणवत्तापूर्ण स्त्री सशक्तिकरण की बात करनी चाहिए. उपलब्धियां गुणवततापूर्ण होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि वैसे पुरूषों को शामिल करना जो औरतों को सशक्त करने में सहायक हो.
उन्होंने कहा कि स्वर हमारे एक हों इसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं. जेंडर के सवाल पर अलग अधिकारी नियुक्त होने चाहिए. सात बार से लगातार सांसद रही सुमित्रा महाजन ने कहा कि यह सबसे जरूरी बात है कि जेंडर बजटिंग हो और सांसद निधि से भी पैसा महिलाओं और बच्चों पर व्यय किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि देश के विभिन्न भागों में महिला अध्ययन केंद्र काम कर रहा है.किन मसलों पर अध्ययन हो रहा है यह सबसे जानना आवश्यक है. उन्होंने कहा कि सांसद होने के नाते उन्हें पूरा क्षेत्र देखना पड़ता है और केवल वे महिलाओं के मसले पर ही अपने को कंेद्रित नहीं कर पाती हैं.
भंिटडा से महिला सांसद हरसिमरन सिंह बादल ने कहा कि मैं पहली बार एम. पी. होकर लोक सभा गई हूं. संसद में बोलना इतना आसान नहीं है दृ हमने अपने संसदीय क्षेत्र में नन्हीं छांव नामक एक योजना प्रारंभ की है. यह बालिकाओं को जन्म न देने की मानसिकता को बदलने के लिए है.उन्होंने कहा कि गुरू ग्रंथ साहिब ने कहा था कि औरतें धरती माता की तरह हैं और उन्हें भी बराबर से जीने दो. हम इन्हीें भावनाओं को लेकर नन्हीं छांव की योजना चला रहे हैं. बालिका भ्रूण के खिलाफ कार्यक्रम देश में कहीं करें तो हम जरूर जाएंगे. पंजाब में औरतों की संख्या अत्यंत कम है. एक हजार में 778 महिलाएं है.उन्होंने मानसिकता में बदलाव की बात कहीं. उन्होंने कहा कि वे भी एक रूढ़िवादी परिवार से आती हैं औरवहां उन्हें इतनी आजादी नहीं थी. लेकिन वे टेक्सटाइल डिजाइग्नर बन गई और राजनीतिक परिवार में शादी हो गई तो एम. पी. बन गई. हर धर्म में औरतों की महत्व बहुत हैं. धरती को भी माता माना गया है और वे केवल देती हैं बदले में कुछ नहीं मांगती हैं.
पश्चिम बंगाल से विकलांग महिला पर काम कर रही कुहू दास ने कहा कि विश्व बैंक के आंकड़े के अनुसार 40 मिलियन विकलांग महिलाएं हैं लेकिन उनके लिए अलग से व्यय नहीं किया जाता है.
विभिन्न राज्यों की तरफ से बीजिंग 15 के लिए अनेक सुझाव आए और कहा गया कि महिलाओं को अब भी व्यक्ति तौर पर अकेला नहीं माना जाता है.उन्हें परिवार से जोड़ कर देखा जाता है.
समाज में महिलाओं के कार्य करने के उपयुक्त वातावरण बनाने और महिलाओं के फ्रंेडली उपकरणों के निर्माण की बात कही गई है.
सुझाव दिया गया कि जो महिलाएं सांसद बनकर आती हैं वे कितनी महिलाओं के हितों की बात करती हैं इसे भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
चेन्नई की नीलावेल्ली ने कहा कि 80 प्रतिशत महिलाएं कृषि संबंधी गतिविधियों से जीती हैं और उन्हें किसान के तौर पर पहचान नहीं मिलती और लाभ भी नहीं मिल पाता है.
सीडाॅ, बीजिंग 15, राष्ट्ीय महिला नीति और औरतों के खिलाफ हिंसा आदि मसलों पर निगरानी के लिए एक केंद्रीय सेल बनाने पर सहमति दी गई इसे राज्यों से जोड़ा जाएगा.
झाड़खंड में पंचायत चुनाव के लिए सरकार से अनुरोध करने की विशेष अनुशंसा की गई.ताकि पचास प्रतिशत महिलाओं को चुनने का मौका मिल सके. मानवाधिकार संगठनों को मजबूत बनाने की बात कही गई.
महिलाओं के आवास अधिकार और भूमि अधिकार सुनिश्चित करने की बात कही गई
महाराष्ट् की नीलम गोरे ने सवाल उठाया कि ग्लोबल फोरम का क्या हुआ.गुड गर्वनेंस बिना औरतों के कल्याण के नहीे हो सकता. जेडर न्याय करना है. ग्लेाबल से लेकर नेशनल तक.
राष्ट्ीय स्तर पर सीडाॅ के लिए समर्थन की जरूरत है.सीडाॅ के बाबत क्या हो रहा है इसे प्रसार प्रचार करना है. इंद्राणी चैधरी ने कहा निगरानी मंच होना चाहिए.
नावो की अध्यक्ष रूथ मनोरमा ने कहा कि व्यावहारिक बातें कहती हूं. सहयोग यूनीफेम के साथ बहुत ध्यान रखा रिश्तों को पालन करने के लिए.
11 पंचवर्षीय योजना के तहत भी मुद्दों को मुख्यधारा में लाने का काम किया है.राजनीतिक भागीदारी की बात भी हमने की लोग नहीं है. महिला घोषणापत्र भी जारी करने की बात हमने की.भारत का ्रपतिनिधित्व बहुत कम है.सरकारें कहती हैं कि पैसा दिया है इस मद में उसे मद में लेकिन नहीं देते हैं.दक्षिण एशिया में गैरबराबरी, विकास, जातिवाद, दंगा और संघर्ष बढ़ा है.
11 रू. प्रतिदिन पर ग्रामीण लोग जीते हैं.दक्षिण एशिया में आबादी ज्यादा है और संसाधन कम मिलते हैं. संसाधन बढ़ने चाहिए.
ऐनी ने कहा कि हमें सभी मामलों को एक साथ मिलकर ही लड़ना होगा. योजना आयोग और सरकारें नहीं कर रही हैं. एफ. सी. आर के कानून बदलने से औरतें भी प्रभावित हो रही हैं.
महिलाएं राजनीतिक भागीदारी कर रही हैं. एशिया में सेक्स अनुपात घट रही है.
कार्यक्रम में कन्याकुमारी से जम्मू काश्मीर तक की महिलाएं थीं उड़ीसा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध््राप्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, आसाम, चेन्नई, केरल, बिहार,यू.पी,. पंजाब, जम्मू काश्मीर आदि राज्यों की महिलओं ने भाग लिया.
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