झारखंडी सत्ता की चाबी गुरूजी के हाथ
रांची: (न्यूजविंग रिपोर्ट) झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि मतदाताओं ने राष्ट्रीय पार्टियों को तवज्जोह नहीं देते हुए क्षेत्रीय दलों में विश्वास जताया है। एकला चलो की राह चुनने वाले शिबू सोरेन को जनता ने 18 सीटों पर विजय दिलाते हुए सिर आंखों पर बैठाया। जबकि भाजपा और कांग्रेस को अपनी-अपनी गठबंधन पार्टियों के साथ क्रमश: 20 और 25 सीटों पर ही संतोष करना पडा। वैसे, कुल मिला कर झारखंड के हिस्से इस बार भी खंडित जनादेश ही आया है।
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| शिबू सोरेन (गुरूजी) |
भाजपा सबसे घाटे में रही। पिछले चुनाव की तुलना में उसके गठबंधन को 16 सीटें गंवानी पडी। कांग्रेस भी अगर सबसे बडा गठबंधन बना है तो महज झाविमो (बाबूलाल मरांडी) के बूते। इस लिहाज से, 11 सीटें लेकर बाबूलाल की नई-नवेली पार्टी झारखंड विकास मोर्चा का प्रदर्शन ठीक-ठाक कहा जा सकता है।
इस चुनावी नतीजों ने एक और बात साबित कर दिया कि झारखंड में भ्रष्टाचार महज बहस-मुबाहसे तक सीमित है। निर्दलीयों की संख्या में इसबार भी इजाफा ही हुआ। तीन सीट की बढत के साथ 13 निर्दलीयों को जीत मिली। जेल में बंद एनोस एक्का, हरिनाराण राय चुनाव जीत गये। हजारों करोड के आरोपी मधु कोडा की पत्नी गीता कोडा भी जीत गयीं। मांडर से विजयी बंधु तिरकी भी कई घोटालों के आरोपी रहे हैं। हालांकि, दागी उम्मीदवारों में, कमलेश सिंह और भानू प्रताप शाही चुनाव हार गये हैं।
| पार्टियां |
विजयी सीटें |
| कांग्रेस + झाविमो | 25 |
| भाजपा + जदयु | 20 |
| झामुमो | 18 |
| राजद + लोजपा | 5 |
| निर्दलीय | 13 |
| कुल सीटें | 81 |
लेकिन, कुल मिलाकर देखें तो झारखंड के मतदाताओं (खासकर ग्रामीण क्षेत्र के) ने शिबू सोरेन में विश्वास जताकर सत्ता की चाबी उनके हाथ सौंप दी है। अब देखना रोचक होगा कि भ्रष्टाचार पर बडे-बडे बोल बोलने वाली राष्ट्रीय पार्टियां गुरूजी को ताज पहनाये बिना कैसे सरकार बनाती हैं !!
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