डोंगरे देशद्रोह के सबूत दें अन्यथा अदालती कार्यवाही झेलें
खंडवा : फिलहाल एनएचडीसी याने नर्मदा हाइड्रो डेवेल्पमेन्ट कारर्पोरेशन में संचालक मण्डल के सदस्य माननीय डोंगरे को अपने एक अनर्गल आरोप के चलते डूब प्रभावितों का गुस्सा झेलना पड़ रहा है। आन्दोलन के समर्थन में जुटे हजारों प्रभावित यह मानते है कि अपने पद का ख्याल रखते हुए माननीय डोंगरे की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रभावितों के अधिकारों की आवाज एनएचडीसी के अंदर और बाहर उठाए। मगर उन्होंने प्रभावितों की दुर्दशा पर ध्यान देने की बजाय आंदोलन पर 50 लाख रूपए चंदा जमा करने का आरोप लगाया है।
| चित्तरूपा पालित, कमला यादव और रामकुंवर रावत सहित नर्मदा बचाओ आन्दोलन के 19 कार्यकर्ताओं को जमानत मिली। मगर जिला न्यायाधीश ने आलोक अग्रवाल की जमानत पर रोक लगाई है। इसके खिलाफ आन्दोलन ने आज उच्च न्यायालय जाने का फैसला लिया है। |
इसके बाद नर्मदा बचाओ आंदोलन ने प्रेस रिलीज जारी करते हुए कहा कि यह आरोप पूरी तरह से आधारहीन है और आंदोलन संस्थागत या विदेशी पैसा नहीं लेता। यह विस्थापितों की लड़ाई के लिये विस्थापितों के सहयोग से चलने वाला आन्दोलन है। सहयोग करने वाले लोगों को सहयोग की रसीद दी जाती है, हर एक खर्च का अकाउन्ट रखा जाता है और उसका आडिट किया जाता है। ऐसे में माननीय डोंगरे या तो देशद्रोह के सबूत दें या फिर अदालती कार्यवाही का सामना करने के लिए तैयार रहें।
यह बात गौर करने लायक है कि सर्वोच्च न्यायालय में केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने आंदोलन के अकाउन्टस की जांच के बाद यह साफ किया था कि आंदोलन के अकाउन्टस पूरी तरह से ठीक हैं। इसके बाद खुद सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलन के पक्ष में फैसला सुनाया। आंदोलन पर इसी प्रकार आधारहीन आरोप लगाने वाली गुजरात की संस्था एनसीसीएल को सर्वोच्च न्यायालय आर्थिक रूप से पहले ही दण्डित कर चुकी है। यहां यह भी गौर करने लायक है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन साल भर में विस्थापितों के हकों की रक्षा के लिये जितना खर्च करता है एनएचडीसी उससे कहीं ज्यादा विस्थापितों को उनके अधिकारों से वंचित करने की कोशिशों में करता है। अगर यकीन न आए तो सर्वोच्च न्यायालय में एनएचडीसी की एक तारीख पर वकीलों पर लुटाने वाले खर्च का ब्यौरा देखें। इसलिए बेहतर होगा कि माननीय डोंगरे विस्थापितों के अधिकारों की लड़ाई का विरोध करने की बजाय विस्थापितों के हकों के लिये आवाज़ उठाए। वह खुद ही तय करें कि प्रभावितों के लिए खेती की जमीन और अन्य लाभ प्राप्त करने के अधिकारों के हनन की कोशिश करने वालों और उच्च न्यायालय के आदेशों के पालन नहीं करने वालों को क्या कहा जाए।
यहां के प्रभावितों की सुने तो डोंगरे ने आज़ तक उनके लिए कोई आवाज़ नहीं उठाई है, वह तो एनएचडीसी के साथ मिलकर सदा ही मौन रहते हैं इसलिए उनकी समस्याएं अनदेखी ही रहती हैं। जबकि देश का कानून कहता है कि जब तक विस्थापितों का संपूर्ण पुनर्वास नहीं हो जाता, तब तक बांध में पानी नहीं भरा जा सकता। इसी कानूनी आधार पर उच्च न्यायालय ने बांध में पानी भरने पर रोक लगा रखी है। इस बीच डोंगरे का बयान यह दिखाता है कि उन्हें विस्थापितों के पुनर्वास से कुछ लेना देना नहीं है। उनका यह बयान विस्थापितों के अधिकारों के हनन को प्रोत्साहन करने वाला और न्यायालय की अवमानना से जुड़ा हुआ है।
रिपोर्ट : शिरीष खरे
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