आखिर, झारखंड बचेगा तभी तो लोग भी..!
- झारखंडी समाज: जडता से उबरा तो स्थिरता का मोहताज (4) -
झारखंड के आमजन में राजनीतिक समझ का स्तर डा मुंडा को दुखी कर देता है। खासकर ग्रामीण आबादी में जागरूकता दर की मंथर रफ्तार से वह क्षुब्ध हैं। वह बता रहे थे कि कैसे गांवों के सीधे-सादे लोगों को चंद पैसे और हडिया-दारू परोसकर भ्रष्ट नेता विधानसभा, संसद की राह आसान कर लेते हैं। सुधार के सवाल पर एकदम बिफर उठते हैं मुंडा- होगा सुधार! वैसे ही, जैसे बंगाल में हुआ था। गुरबत, अत्याचार, छल से आक्रोशित लोग उमड पडे थे चौरंगी की सडकों पर। यही हाल रहा तो झारखंड में भी वैसा ही होगा। अंदाजा लगाइये उस नजारे का जब दस लाख लोग रांची के मेन रोड, पुरूलिया रोड पर एकसाथ उतर आयें!.. ’
70 वर्षीय मुंडा-आदिवासी डा रामदयाल का यह तेवर यहां के पिछडे पठारी अवाम की पीडा बयां कर रही है। दर्द के समुंदर की हिलोरें हैं यह। दुनिया के सबसे विकसित देश अमेरिका में 18 साल रह चुके डा मुंडा पिछले ढाई दशक से झारखंड को काफी नजदीक से महसूसते रहे हैं।
लेकिन, फिर वही यक्ष प्रश्न- पौने तीन करोड में से दस लाख भी एक सवाल पर एकसाथ कैसे आयें? संभलते हुए डा मुंडा कहते हैं कि असल तो है उस मुद्दे को तय करना। मुंडा भी मानते हैं कि झारखंडी समाज बुरी तरह बंटता जा रहा है। स्वार्थी राजनीतिकों ने तात्कालिक क्षुद्र लाभ के लिये यह दुर्दशा कर डाली है। मुद्दे तो कई सामने आते हैं, लेकिन उससे भी तेजी से उपजने लगती है मतभिन्नता। इसलिये, सबसे पहले जरूरी है उन राजनीतिक चेहरों को दरकिनार करना।
हाल के राजनीतिक घटनाक्रम से कुछ अच्छे संकेत भी मिल रहे हैं। राष्ट्रपति शासन का दूसरा टर्म चल रहा है। विधानसभा भंग नहीं हुआ। शायद इस आशा में कोई तो सरकार बना ले। लेकिन, पार्टियों-राजनेताओं को मौजूदा चेहरों के बीच अब समीकरण ही नहीं सूझ रहा। जाहिर है, ये चेहरे अब खारिज हो चुके हैं। सही वख्त है, जनता भी उन्हें खारिज करे। नये चेहरों की कमी नहीं है। बस, मुद्दे ऐसे हों जिसमें कम से कम विरोधाभास हो। जनांदोलनों के बहाने ही सही, औद्योगिकरण-विस्थापन, बाहरी-भीतरी, जैसे ज्वलंत सवालों पर बहस भी शुरू हुई है। हठ छोड, दोनों ओर से कुछ कदम आगे बढें तो सर्वसम्मत मुद्दे अवश्य आकार लेंगे। आखिर, झारखंड बचेगा तभी तो लोग भी..! (जारी)
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