30 साल पहले हुआ था जालिम नरसंहार, पीड़ितों की आंखों में आज भी नौकरी और मुआवजे का इंतजार

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 04/17/2018 - 15:16

Manoj Dutt dev

Latehar : वर्ष 1988 में तत्कालीन पलामू जिला और वर्तमान में लातेहार जिला के सदर थाना क्षेत्र के ज़ालिम ग्राम में दो जातियों में हुई हिंसक झड़प में आठ लोगों की हत्या हुई थी. नरसंहार का नज़ारा इतना भयावह था कि मामला दिल्ली तक पहुँच गया था और ग्राम में कई दिनों तक पुलिस कैम्प करती रही थी. दोनों पक्षों पर नरसंहार का मामला दर्ज कर कुल 60 लोगों को जेल भेजा गया था.

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प्रेम प्रसंग के मामले ने लिया था नरसंहार का रूप

उस घटना के अभियुक्त रहे कुंज लाल सिंह के मुताबिक वर्ष 1988 में गांव के एक युवक द्वारा एक युवती से छेड़छाड़ के मामले ने काफी तूल पकड़ा लिया था, जिसके बाद पंचायत बैठी थी. फिर किसी तरह मामले को शांत कराया गया था. मगर इसी बीच अफवाह उड़ी कि सूंड़ी पक्ष के एक व्यक्ति को पलियर पक्ष ने मार गिराया है. जबकि ऐसी कोई घटना हुई ही नहीं थी. लेकिन खबर की सच्चाई की पड़ताल किये बिना ही सूंड़ी पक्ष ने पलियर पक्ष पर हमला किया, जिसमे सत्यनारायण सिंह मारा गया एवं उसका भाई घायल हो गया. इस घटना के बाद आगबबूला हुए पलियर पक्ष ने भी प्रतिशोध के रूप में सूंड़ी पक्ष के कुल सात लोगों की हत्या कर दी थी और कई घरों में आग लगा दी थी . जिसके बाद लातेहार पुलिस ने अनुसंधान कर पलियर पक्ष के 41 लोगो एवं सूंड़ी पक्ष के 19 लोगो को गिरफ्तार कर जेल भेजा था.

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प्रशासनिक पत्र

घटना में शामिल 60 अभियुक्तों को मिली थी उम्रकैद

1988 में ही घटना के तुरंत बाद चिन्हित 60 अभियुक्तों को पुलिस ने जेल तो भेज दिया, मगर उसी साल घटना के तीन माह बाद ही पलियर पक्ष के 41 लोगों में 39 लोग हाईकोर्ट से जमानत लेकर बाहर निकाल गए, वहीं इस पक्ष के दो अन्य लोग 1992 में हाईकोर्ट से जमानत लेकर निकले थे. जबकि सूंड़ी पक्ष के सभी 19 अभियुक्त 1988 में ही तीन माह बाद हाईकोर्ट से जमानत पर छूटे थे. इसके ठीक 17 साल बाद 2005 के 17 जून को दोनों पक्षों के सभी 60 अभियुक्तों को लातेहार न्यायलय ने हिरासत में लिया और 22 जून को दस हजार जुर्माना के साथ उम्रकैद की सजा सुना दी. साथ ही अभियुक्तों को केंद्रीय कारा होटवार जेल भेज दिया. जेल में रहने के दौरान दोनों पक्षों के अभियुक्तों ने हाईकोर्ट में फिर अपील की, जिसपर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सूंड़ी पक्ष के सभी अभियुक्तों को तीन वर्ष छ: माह में ही रिहा कर दिया. जबकि पलियर पक्ष को सात साल बाद वर्ष 2012 के मई महीने की 17 तारीख को राहत मिली.

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सात वर्षों तक गांव में नहीं हुई थी किसी की शादी

2005 में निचली अदातल के फैसले के बाद ग्राम के 60 अभियुक्त जेल चले गए थे, जिसके बाद गांव में वीरानगी का आलम था. 2005 से 2012 तक गांव के किसी भी घर में शादी की शहनाई नहीं गूंजी थी और न गांव में कोई समारोह ही हो पाया था. साल 2012 में हाईकोर्ट का सकारात्मक फैसला आने के बाद गांव की खुशियां लौट पायी. फिर सभी गिले शिकवे भूलकर एक दूसरे के गले लगे. नम आंखों से एक दूसरे का अभिवादन किया.

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निर्दोश साबित होने और बाइज्जत बरी होने के बाद भी सभी को नहीं मिली नौकरी

1988 में हुए जालिम नरसंहार का मामला 2012 में खत्म हुआ सभी अभियुक्त निर्दोश करार देकर बाइज्जत बरी किये गए. लेकिन इस केस की वजह से उनकी जिंदगी तबाह हो चुकी थी. वहीं, नरसंहार में मारे गए लोगों के आश्रितो को भी ना नौकरी मिली और न मुआवजा ही मिला. गौरतलब है कि दोनों पक्षों के मात्र दो लोगों को ही नौकरी मिली है. जबकि अन्य को भी मिलना चाहिए था. सूंड़ी पक्ष से मनोहर साव के बेटे अजय साव को एवं पलियर पक्ष से सत्यनारायण सिंह कि पत्नी संतोषी कुंवर के साथसाथ घटना के पीड़ित परिवार के अन्य सदस्यों को भी नौकरी एवं आर्थिक सहायत देने के लिए साल 2016 में सरकार के अवर सचिव राजेश कुमार ने महानिदेशक एवं पुलिस महानिरीक्षक के माध्यम से लातेहार उपायुक्त एवं पलामू उपायुक्त को ज्ञापन संख्या 2244 दिनांक 10.05.2016 को पत्र लिख कर नौकरी एवं आर्थिक सहायता देने कि अनुशंसा की थी, जो महज एक खानापूर्ति ही साबित हुआ.

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दोनों जिलों के पास नहीं है नरसंहार की घटना का कोई लेखा-जोखा

सरकार के अवर सचिव का पत्र प्राप्त होते ही दोनों जिलों लातेहार और पालमू के प्रशासनिक अधिकारियों ने घटना का किसी भी तरह का लेखा जोखा होने से इंकार दिया, जैसे ज़ालिम नरसंहार हुआ ही नहीं था. लिहाजा घटना के शिकार हुए पीड़ित परिवार आज नौकरी और आर्थिक सहायता के लिए दर बदर की ठोकरें खा रहे हैं. उनकी पथराई आंखें आज भी राहत का इंतजार कर रही हैं, मगर सिस्टम है, जो लोगों के आंसुओं के प्रति बेपरवाह बना हुआ है.

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