रांची में कहां मिलता है समाज की बहिष्कृत नारियों को सहारा, जानिए इस रिपोर्ट में...

Submitted by NEWSWING on Sat, 01/13/2018 - 20:32

Md. Asghar Khan, Ranchi: जब महिलाओं को पहले समाज, फिर खुद का परिवार ही बेघर कर दे, तब वैसी महिलाओं के समक्ष जीवन की चुनौतियां और भविष्य की चिंता आ खड़ी होती है. अधिकतर इनके भार से नहीं उभर पाने वाली महिलाएं आत्महत्या का रास्ता चुनने को बेबस हो जाती हैं. ऐसी ही लड़कियों और महिलाओं को रांची की एक संस्था सहारा देती है. उन्हें ढूंढ़कर उनका घर बसाती है, या फिर आत्मनिर्भर बनाती है. नाम है 'स्नेहाश्रय' नारी निकेतन और पता है रोड नंबर-10 अरसण्डे कांके, जहां अबतक 100 सौ से अधिक समाज की बहिष्कृत नारियां पनाह पा चुकी हैं. स्नेहाश्रय नारी निकेतन की स्थापना सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 25 जून 2015 में किया था, जिसका संचालन कल्याण विभाग की ओर से सहायता प्राप्त संस्था झारखंड महिला समाख्या सोसाइटी रांची करती है. इस संस्था की निदेशक डॉ स्मिता गुप्ता बताती हैं कि इन महिला और लड़कियों की निजता(प्राईवेसी) को प्रथामिकता देते हुए इनका पुनर्वास किया जाता है.

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नबालिगों ने दिया बच्चों को जन्म

दो मंजिले इस भवन के 14 कमरे की क्षमता भले ही 25 महिलाओं की हो, लेकिन यहां के पीड़िता के दर्द अनेक हैं. Newswing.com ने जब इन लड़कियों से बात की तो कई के दर्द आंसुओं के साथ छलक आए. दर्जनों ऐसी लड़कियां मिली, जो शोषण का शिकार हुई थीं.

सोनम मुंडा (बदला हुआ नाम) की उम्र 18 वर्ष है और साथ में आठ माह की बच्ची. सोनम बताती हैं कि उनका घर रांची में ही है, पर आज बेघर हैं. एक लड़का प्यार के बहाने शोषण करता था. जब पेट से हुई तब घर वालों को बताया, लेकिन लड़के ने शादी से इंकार कर दिया. मां-बाप ने घर से निकाल दिया, कई हफ्तों तक गर्भ की अवस्था में बाहर रही.

बिंदिया (बदला हुआ नाम) की भी उम्र 18 ही है, और साथ में दो माह का लड़का भी. ठीक से नहीं बोल पाने के कारण घर का आज तक पता नहीं चल पाया है, लेकिन वो बताती हैं कि उसकी दो बहन है. बिंदिया अक्सर कहती है कि मेरी शादी हो गई है. पति का नाम छोटका नरायण है, लेकिन हम अब उसके साथ नहीं रहना चाहते हैं, क्योंकि उसने मुझे बहुत मारा-पीटा है. संस्था की मुख्य समन्वयक अरुणा कुमारी ने कहना है कि बिंदिया को हमलोगों ने आंध्र प्रदेश से लाया है. लड़के का पता चल गया है. उसके घर वालों के संमर्क में है.

निशा कुमारी (बदला हुआ नाम) 16 वर्ष में ही एक बच्ची की मां बन गई थी, लेकिन अपने ही घर वालों के सितम के आगे निशा को नारी निकेतन में सहारा लेना पड़ा. वो बताती हैं कि मेरे घर वालों ने उसपर (प्रेमी) पर अपरहण का केस कर जेल तक भेजवा दिया. मुझपर बच्चे को गिराने के लिए मारपीट से लेकर हर तरह का दबाव डाला. निशा का प्रेमी बाहर है, जो अब बोकारो से हमेशा उससे मिलने निकेतन आता रहता है. जल्द ही निशा की उम्र 18 वर्ष हो जायेगी, जिसके बाद उसके सुसराल वाले उसे घर ले जायेंगे.

रुबी तिर्की (बदला हुआ नाम) भी रांची की है, जिसकी जिंदगी विवाहित लड़के के झांसे में आकर झुलस गई. रुबी नाबालिग अवस्था में ही मां बन गई. वो बताती हैं कि उसने मेरे साथ शादी तो की, लेकिन घर ले जाने से हमेशा इंकार करता रहा. दोस्त-यार के यहां रखता था. जब प्रसव का समय आया तब मुझे मेरी बड़ी मां ने निर्मल हद्य पहुंचा दिया, जहां मैंने बच्ची को जन्म दिया. अपने घर गई तब भाई बहन मार-पीट करने लगे. पिता को पता है कि बेटी कांके के नारी निकेतन में हैं, लेकिन ले जाने को तैयार नहीं हैं.

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आत्मनिर्भर बनीं लड़कियां और महिलाएं

'स्नेहाश्रय' नारी निकेतन  में फिलहाल 17 लड़कियां, महिलाएं हैं. संस्था का काम समाज से सताई हुई, प्रताड़ित, शोषित नारियों को घर,

भोजन, चिकित्सा सुविधा देकर उनका पुनर्वास करना है, जबकि वैसी महिलाएं, जिनका कोई घर नहीं या फिर अब वे वापस अपने घर नहीं जाना जाना चाहतीं उन्हें कौशल विकास योजना के माध्यम से ट्रेनिंग दिलाकर आत्मनिर्भर बनाया जाता है. अबतक दर्जनों लड़कियों को ट्रेनिंग दिलाकर स्वलंबन बनाया जा चुका है. संस्था की मुख्य समन्वयक ने बताया कि इसी आठ जनवरी को ही संस्था से चार लड़कियों का चयन तमिलनाडु की कंपनी बेस्ट प्रैक्टिक्स प्रवाइवेट लिमिटेड में हुआ है. इन्हें यहां सात-सात हजार रुपया मिलेगा, साथ ही फूडिंग, लॉजिंग फ्री है. इन्होंने कौशल विकास ट्रेनिंग के तहत फैशन डिजाइनिंग कम सिलाई का प्रशिक्षण प्राप्त किया था.

अभी भी है घर लौटने की उम्मीद

संस्था में कई ऐसी लड़कियां भी हैं, जिन्हें अभी भी लगता है कि उन्हें उनका पति घर ले जाने आयेगा. अनिता कुमारी (बदला हुआ नाम) दो

Women Safe Haven
Women Safe Haven

महीने की बच्ची को गोद में लिए हुए कहती हैं कि उनके हजारीबाग स्थित घर में अब मां-बाप नहीं हैं. लव मैरेज की थी, पति घर भी ले गये थे, लेकिन सुसराल वाले उनकी दूसरी शादी करवाना चाहते हैं. सास मुझे गैर जाति का बताकर मेरे साथ मारपीट करती थी, इसलिए घर से निकल गयी. वो कहती है कि मैं अपने पति के साथ ही घर में रहना चाहती हूं.

शीला( बदला हुआ नाम) की कहानी बहूत दुर्भाग्यपूर्ण है. शादी के बाद दो माह तक ही अपने सुसराल रही, लेकिन एक भी दिन पति-पत्नी की तरह रह सकी. शीला बताती हैं कि इस दौरान कई बार उसके घर वालों से पैसा मांगवा गया. सुसराल वालों ने उन्हें प्रताड़ित कर पागल बताकर अस्पताल में भर्ती करवा दिया. अब वो कहती हैं कि मैं अपने घर नहीं अपने पति के पास रहना चाहती हूं.

वहीं, बार-बार ज्योति शर्मा( बदला हुआ नाम) को पति के द्वारा मायके पहुंचाना, फिर मायके वालों का ताना देकर सुसराल पहुंचाना, उन्हें तकलीफ देता था, क्योंकि इस बीच वो लगातार पति की प्रताड़ना झेलती रही. अंत में खुद से निकल गई. औरों की कहानी भी इसी तरह की थी.

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