Hydrogel क्या है? यह जलसंकट से कैसे बचा सकता है.

Publisher NEWSWING DatePublished Tue, 02/06/2018 - 12:53

Prem Anand

देश में अभी से ही जलसंकट (Water Scarsity) के आसार नजर आने लगे हैं. गर्मी में पिछले साल झारखंड, बिहार,  ओडिशा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश  समेत देश के कई राज्यों में सूखे ने खेत को पूरी तरह से चौपट कर दिया। कई जगहों पर पेयजल संकट भी देखने को मिला. सूखे के कारण ग्रामीण इलाकों से लोगों का पलायन भी होता चला गया.

पीने के पानी पर भी आफत

कुल मिलाकर हालात ऐसे हैं,  जिससे आने वाले समय में जलसंकट (Water Scarsity) और विकराल रूप लेगा. देश की बढ़ती आबादी के लिये पेयजल के अलावा बड़ी मात्रा में खेती के लिये पानी की जरूरत पड़ेगी. पानी के बेहतर प्रबंधन की सख्त जरूरत है, ताकि भविष्य में जल संकट से मुकाबला किया जा सके.

पानी का हो बेहतर इस्तेमाल

भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित है,  इसलिये सिंचाई में ऐसी पद्दति का इस्तेमाल करना होगा, जिससे पानी का बेहतर-से-बेहतर इस्तेमाल किया जा सके.

भारत में कुल खेती का 60 प्रतिशत खेती ऐसे क्षेत्र में की जाती है, जहां पानी की बेहद किल्लत है. इनमें से 30 प्रतिशत जगहों पर पर्याप्त बारिश नहीं होती है. बताया जाता है कि विश्व के 181 देशों में जलसंकट है,  भारत इस सूची में 41वें स्थान पर है।

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1150 मिमी से कम होती है बारिश

भारत में खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है। देश में 60 प्रतिशत खेती बारिश के पानी पर निर्भर है और इन क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा 1150 मिलीमीटर से भी कम होती है. यह सब देखते हुए खेती में पानी का बेहतर इस्तेमाल वक्त की जरूरत है.

80 प्रतिशत पानी खेती के लिये

भारत में पानी की जितनी खपत होती है,  उसका 80 प्रतिशत हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है. औद्योगिक क्षेत्र में 15 प्रतिशत और घरेलू क्षेत्रों में 5 प्रतिशत पानी का उपयोग हो रहा है, लेकिन जिस तरह देश की आबादी में बढ़ोत्तरी हो रही है और कल कारखाने खुल रहे हैं,  उससे आने वाले समय में पानी की घरेलू और औद्योगिक खपत बढ़ेगी, जिसका परिणाम यह निकलेगा कि खेती के लिये पानी की और किल्लत हो जाएगी.

हाल ही में कृषि विज्ञानियों ने एक शोध किया है, जिसमें पता चला है कि हाइड्रोजेल की मदद से बारिश के पानी को स्टोर कर रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है, जब फसलों को पानी की जरूरत पड़ेगी.

क्या है हाइड्रोजेल

hydrogel
हाइड्रोजेल्स

हाइड्रोजेल पोलिमर ( Hydrogel polymer) है, जिसमें पानी को सोख लेने की अकूत क्षमता होती है और यह पानी में घुलता भी नहीं. हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल भी है जिस कारण इससे प्रदूषण का खतरा भी नहीं है.

क्या कहते हैं कृषि विज्ञानी

करेंट साइंस में 'हाइड्रोजेल्स : ए बून फॉर इनक्रीजिंग एग्रीकल्चरल प्रोडक्टिविटी इन वाटर-स्ट्रेस्ड एनवायरमेंट' शीर्षक से छपे शोधपत्र में कृषि विज्ञानियों ने कहा है कि खेतों में हाइड्रोजेल के इस्तेमाल से पानी को खेतों में ही स्टोर कर रखा जा सकता है और जब फसल को पानी की जरूरत पड़ेगी और बारिश नहीं होगी, तब हाइड्रोजेल से निकलने वाला पानी फसलों के काम आएगा.

उर्वरा शक्ति को नुकसान नहीं

यह शोध महात्मा फूले कृषि विद्यापीठ के अनिकेत कोल्हापुरे,  जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के राजीव कुमार,  वीपी सिंह और डीएस पांडेय ने संयुक्त रूप से किया है. शोधपत्र में कहा गया है कि हाइड्रोजेल खेत की उर्वरा शक्ति को तनिक भी नुकसान नहीं पहुंचाता है और इसमें 400 गुना पानी सोख लेने की क्षमता होती है. शोधपत्र में कहा गया है कि एक एकड़ खेत में महज 1 से 2 किलोग्राम हाइड्रोजेल ही पर्याप्त है. हाइड्रोजेल 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खराब नहीं होता है,  इसलिये इसका इस्तेमाल ऐसे क्षेत्रों में किया जा सकता है, जहां सूखा पड़ता है.

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शोधपत्र में कहा गया है कि हाइड्रोजेल के कण बारिश होने पर या सिंचाई के वक्त खेत में जाने वाले पानी को सोख लेते हैं और जब बारिश नहीं होती है, तो कण से खुद-ब-खुद पानी रिसता है, जिससे फसलों को पानी मिल जाता है. फिर अगर बारिश हो तो हाइड्रोजेल दुबारा पानी को सोख लेता है और जरूरत के अनुसार फिर उसमें से पानी का रिसाव होने लगता है.

2 से 5 वर्षों तक करता है काम

शोधपत्र के अनुसार, खेतों में हाइड्रोजेल का एक बार इस्तेमाल किया जाये,  तो वह 2 से 5 वर्षों तक काम करता है और इसके बाद ही वह नष्ट हो जाता है, लेकिन नष्ट होने पर खेतों की उर्वरा शक्ति पर कोई बुरा असर नहीं डालता है,  बल्कि समय-समय पर पानी देकर फसलों और खेतों को फायदा ही पहुंचाता है.

इसका कब-कब करें इस्तेमान

हाइड्रोजेल का इस्तेमाल उस वक्त किया जा सकता है, जब फसलें बोई जाती हैं. फसलों के साथ ही इसके कण भी खेतों में डाले जा सकते हैं. हाइड्रोजेल के इस्तेमाल को लेकर कई प्रयोगशालाओं में व्यापक शोध किया गया है और इन शोधों के आधार पर ही यह शोधपत्र तैयार किया गया है.

शोधपत्र में कहा गया है कि मक्के,  गेहूं,  आलू,  सोयाबीन,  सरसों,  प्याज,  टमाटर,  फूलगोभी, गाजर,  धान,  गन्ने,  हल्दी,  जूट समेत अन्य फसलों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल कर पाया गया कि इससे उत्पादकता तो बढ़ती है, पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान भी नहीं होता है.

विधानचंद्र कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस के पॉल कहते हैं हाइड्रोजेल बेहतर विकल्प है और इस तरह के और भी प्रयोग होने चाहिए.

 

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