'पैडमैन' के जरिये घरों के अंदर अर्से से दबे “पीरियडस” जैसे अहम मुद्दे पर खुलकर बातचीत शुरू होने के आसार

Publisher NEWSWING DatePublished Thu, 12/21/2017 - 14:17

ANITA TANVI
पीरियड के दौरान एक महिला हैवी ब्लीडिंग, शरीरिक-मानसिक असहजता, असहनीय दर्द और कष्ट से गुजरती है. बावजूद इसके आज तक इस विषय पर महिलाएं खुल कर बात करने में कतराती हैं. दुकान जाती हैं, तो चुपचाप पैडस के पैकेटस उठाती हैं, दुकानदार को पैकेटस देती हैं, ठीक उसी तरह से दुकानदार भी पैडस के दाम लेता है पेपर में लपेटता है और वापस महिला को दे देता है. महिला बिना किसी सवाल-जवाब के उसी अंदाज में चुपचाप दुकान से निकल जाती है. इतना ही नहीं भारत के विभिन्न निम्न आय वर्ग में खासतौर पर ग्रामीण गरीब महिलाएं तो पैडस की डिमांड भी नहीं करतीं और कम आय के कारण अपनी स्वास्थ्य जरूरतों को ताक पर रख कर इसके कोई और आप्शंस तलाशती हैं. इस विषय पर खुल कर बात करना आज भी जैसे एक सपना है. क्यों आखिर यह विषय इतना बड़ा होते हुए भी चर्चा के लिहाज से गौण है.

झारखंड में लड़कियों और महिलाओं की स्थिति पर क्या कहते हैं आंकड़े

2016 के नीलसेन सर्वे की मानें तो झारखंड और बिहार में गरीबी के कारण लाखों लड़कियां और महिलाएं पीरियडस के दौरान पैडस का इस्तेमाल नहीं करतीं. करीब 93 प्रतिशत लड़कियां इस दौरान हर महीने दो दिन स्कूल ड्रॉप करती हैं. झारखंड में पीरियडस के दौरान सुरक्षित और स्वच्छ उपाय अपनाने वाली 15 से 24 आयु वर्ग की किशोरियों और महिलाओं का प्रतिशत 18 है. यह शहरी क्षेत्र में 77.2 प्रतिशत, ग्रामीण क्षेत्रों में 39.4 प्रतिशत है यानि की कुल मिलाकर 49.6 प्रतिशत महिलाएं पीरियडस के दौरान सुरक्षित और स्वच्छ उपाय अपनाती हैं. हालांकि वह इस दौरान पैडस का ही यूज करती हैं, यह स्पष्ट नहीं है. 

भारत में 57.6 प्रतिशत महिलाएं अपने मासिक के दौरान सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं

हालिया नेशनल हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 48.5 प्रतिशत जबकि शहरी क्षेत्रों में 77.3 प्रतिशत महिलाएं सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं. यानि कुल मिला कर भारत में 57.6 प्रतिशत महिलाएं अपने मासिक के दौरान सेनेटरी नैपकिन यानि पैडस का इस्तेमाल करती हैं. भारत भर में प्रकाशित मौजूदा शोध की मानें, तो भारतीय महिलाओं में सेनेटरी नैपकिन का उपयोग 35 प्रतिशत से 57 प्रतिशत के बीच होता है. 
भारत में 24 प्रतिशत टीनेजर्स मासिक धर्म के दौरान स्कूल ड्रॉप करती हैं
मासिक धर्म के दौरान स्कूल ड्रॉप करने वालों में कैनेडा में 17 प्रतिशत टीनेजर्स, वाशिंगटन में 21 प्रतिशत, ऑस्ट्रेलिया में 26 प्रतिशत, टेक्सास में 38 प्रतिशत जबकि भारत में इसका आंकड़ा 24 प्रतशित टीनेजर्स का है.

भारत में 11.35 से 72.6 प्रतिशत लड़कियां पीरियडस के दौरान होने वाले दर्द की वजह से स्कूल ड्रॉप करती हैं

आपको यह जानकर और भी आश्चर्य होगा कि स्कूल ड्रॉप करने के पीछे की इनकी वजह सेनेटरी नैपकिन और टॉयलेट नहीं है बल्कि इसके पीछे की वजह है इस दौरान होनेवाले दर्द और कष्ट. इस संबंध में अगर आंकड़े की बात करें, तो यूएस में पीरियडस के दौरान होने वाले दर्द की वजह से करीब 46 प्रतिशत लड़कियां स्कूल ड्रॉप करती हैं. भारत में इसका दर 11.35 से 72.6 प्रतिशत है, वहीं ऑस्ट्रेलिया में 94 प्रतिशत,  टेक्सास में 85 प्रतिशत, सिंगापुर में 83.2 प्रतिशत और वाशिंगटन में 65 प्रतिशत स्कूली लड़कियां इस दौरान होने वाले दर्द और परेशानी की वजह से अपना स्कूल ड्रॉप करती हैं. 

50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत महिलाओं में हैवी ब्लीडिंग की समस्या

अब अगर बात करें इस दौरान होने वाली हेवी ब्लीडिंग की तो भारत में एक प्रतिशत से 23 प्रतिशत तक महिलाएं और लड़कियां इस परेशानी को बर्दाश्त करती हैं. वहीं इंगलैंड में 52 प्रतिशत, यूके में हर आयु वर्ग की 20 प्रतिशत महिलाएं, यूएसए में 30 प्रतिशत महिलाएं इससे परेशान होती हैं. कुल मिलाकर करीब 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत महिलाआं में हैवी ब्लीडिंग की समस्या होती है.

संकोच छोड़ चर्चा करने की है जरूरत

इस दौरान होनेवाली सारी परेशानियों, कष्टों और दर्द को बिना कहे ही मां, बहन और सखियों के साथ सिर्फ इशारों में प्रकट करती हैं. अंदाज कुछ ऐसा होता है कि घर के पुरूष जैसे कि पिता, भाई, पति को इसकी भनक भी न पड़े. भारत में इस विषय पर बात करनेवालों की संख्या बहुत कम है. यहां तक कि कितनी भी इमरजेंसी हो भाई और पिता से तो महिलाएं पैडस लाने के लिए कहने में भी सौ बार सोचती हैं. जबकि यह हर महिला की एक आम शारीरिक स्वास्थ्य प्रक्रिया है, जिससे हर महीने उन्हें गुजरना पड़ता है. ऐसा नहीं है कि पुरूषों को जानकारी नहीं लेकिन सामाजिक परंपरा जिस तरह से चली आ रही है उस हिसाब से पुरूष वर्ग भी खुद को इस विषय से दूर रखे हुए हैं. लेकिन जैसे निजि टॉयलेट हर महिला का अधिकार है,  बिल्कुल वैसे ही इस दौरान होनेवाले शारीरिक कष्टों और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिहाज से सेनेटरी पैडस भी हर महिला और किशोरियों का अधिकार है. अब शायद वक्त आ गया है, जब इस पर चर्चा किये जाने और समझने की जरूरत है. 

अरूणाचलम  मुरूगनंतम ने की थी शुरूआत

इसकी शुरूआत तमिलनाडु के अरूणाचलम मुरूगनंतम ने की. जब उन्होंने देखा की उनकी पत्नी पीरियडस के दौरान पैड न खरीद पाने की वजह से अखबार और पुराने कपड़े का इस्तेमाल कर रही थी, उन्होंने महिलाओं की इस समस्या को खत्म करने की ठानी. अरूणाचलम मुरूगनंतम का योगदान एकबार फिर अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन के जरिये लोगों के सामने होगा. टॉयलेट एक प्रेम कथा के द्वारा शौचालय की महता को लोगों के सामने रखने वाले अक्षय कुमार अब सेनेटरी नैपमिन के बारे में लोगों को जागरूक करते नजर आयेंगे. 

अरूणाचलम को उनके  योगदान के लिए मिले हैं कई अवार्ड

अरूणाचलम ने सस्ते से सस्ते पैडस बनाने की ठानी और इसमें सफल भी हुए. कई अवार्ड भी मिले. इस मशीन को बनाने में उन्हें करीब दो साल लगे. उनके योगदानों के लिए उन्हें पदमश्री से भी सम्मानित किया जा चुका है. उन्होंने अपने अविष्कार को 2006 में आईआईटी मद्रास के सामने रखा था. उनके इस अविष्कार को नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन ग्रासरूट टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन अर्वाड जीता. इसके बाद उन्होंने जयाश्री इंडस्ट्रीज के नाम से अपनी कंपनी स्थापित की. जयाश्री इंडस्ट्रीज द्वारा बनायी गयी 188 से ज्यादा मशीनें भारत के 5 राज्यों के अलावा अन्या सात देशों में स्थापित की गयी हैं. कई कॉरपोरेट संस्थाओं ने उनके इस अविष्कार को खरीदने की कोशिश की लेकिन उन्होंने बचने से मना कर दिया.

देखें विडियो :  

 

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