सर्वे का खुलासाः नगड़ी के लोगों ने DBT योजना को नकारा, इसके कारण दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं लाभुक

Publisher NEWSWING DatePublished Wed, 02/21/2018 - 17:09

Ranchi: बरीडीह जारटोली गांव के समीर नागडुअर कहते हैं- अब तो सरकारी राशन लेना दूर की कौड़ी बनता जा रहा है. राशन लेने की प्रक्रिया में 3 से 4 दिन की मजदूरी जाया होती है. जब से यह नई योजना शुरु हुई है, हमारे बैंक खाते में एक बार भी अनाज सब्सिडी का पैसा नहीं आया है. सरकार ने गरीबों के राशन का हक छीनने के लिए डीबीटी योजना लागू की है.

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DBT के तहत अब 31.60 रुपये प्रति किलो की दर से सब्सिडी मिलनी है

अक्टूबर 2017 में झारखंड सरकार ने रांची से जुड़े हुए नगड़ी प्रखंड में जन वितरण प्रणाली में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजना शुरू किया. राशन दुकान पर 1 रुपये प्रति किलो की दर से चावल के बजाए, राशन कार्डधारियों को अब 31.60 रुपये प्रति किलो की दर से सब्सिडी उनके बैंक खाते में मिलनी है और उन्हें 32.60 रुपये प्रति किलो की दर से राशन दुकान से चावल खरीदना है. अगर यह योजना सफल होती है, तो झारखंड सरकार इसे पूरे राज्य में लागू करेगी.

सर्वे का रिजल्ट योजना के खिलाफ

नगड़ी में हाल में हुए सर्वे में जो बातें समाने आयी है, वह सरकार के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजना शुरू किये जाने के खिलाफ जाती नजर आ रही है, नगड़ी के ग्रामीण पीडीएस लाभुकों में से सरकार की इस नई योजना के खिलाफ में 97 प्रतिशत लोगों ने अपना मत रखा और पुरानी योजना को ही राशन के तहत लागू करने की बात कही.

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25 प्रतिशत लाभुकों को समय पर नहीं मिला जनवरी का पैसा

राशन लेने के लिए जनवरी माह में ग्रामीण बैंक के चक्कर काटते रहे. विभन्न सामाजिक संगठनों द्वारा किये गये सर्वे में चौंकाने वाली बात समाने आयी. जनवरी 2018 में 25 प्रतिशत कार्डधारियों को पैसे नहीं मिल रहे थे. जिनके खाते में पैसा आ रहा है, वह भी कई समस्याएं झेल रहे हैं. कई परिवारों को पता ही नहीं चल रहा है कि उनका पैसा किस खाते में आ रहा है (सर्वे किये गये परिवारों के पास औसतन 3-4 बैंक खाते हैं). चूंकि अधिकतर परिवारों को उनके खाते में पैसा आने पर मोबाईल में सन्देश नहीं आता, ऐसे लोगों को बैंक के कई चक्कर काटने पड़ते हैं.

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कार्डधारियों को बैंक से पैसा निकालने नहीं दिया जाता 

प्रखंड के कुछ बैंक तो कार्डधारियों को पैसा निकलने भी नहीं देते (यह बोल कर कि निकासी की गई राशि बहुत कम है). लोगों को फिर प्रज्ञा केंद्र या बिज़नेस कॉरेस्पोंडेंट के पास दौड़ना पड़ता है, जो अक्सर घूस लेते हैं. इससे कार्डधारियों के समय व पैसे की बर्बादी होती है. सबसे अधिक परेशानी वृद्ध, विकलांग व उन लोगों को होती है जिनके लिए काम छोड़कर बैंक जाना मुश्किल होता है. इसके अतिरिक, राज्य के बाकी क्षेत्रों के प्रकार नगड़ी में भी आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन से जुड़ी समस्याएं हैं. यह सत्यापन प्रणाली प्रज्ञा केन्द्र व राशन दुकान दोनों में लागू है. यह स्पष्ट नहीं है कि जब राशन दुकान में आधार-आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य है, तो DBT की क्या आवश्यकता है.

DBT प्रणाली से डीलर भी परेशान, हर महीने 4-5 लाख रुपये के लेन-देन पड़ते हैं संभालने

DBT प्रणाली से डीलर भी परेशान हैं क्योंकि उनको अब राशन वितरण करने में अधिक समय लगता है और हर महीने 4-5 लाख रुपये के लेन-देन संभालने पड़ते हैं. असफल DBT योजना की श्रृंखला में नगड़ी सबसे हाल की कड़ी है. चंडीगढ़, पुडूचेरी व दादरा एवं नगर हवेली में लागू किये गये DBT पायलट पर निति आयोग द्वारा किये गये सर्वे में पता चला कि DBT जन वितरण प्रणाली के अधिकार प्राप्त करने का अधिक महंगा विकल्प है. सर्वे में यह भी पता चला कि समय के साथ कुछ लोगों के खाते में पैसे आने बंद हो गये. जबकि इन पायलटों में लोगों को बाज़ार से अनाज खरीदने की छूट थी. नगड़ी में कार्डधारी केवल राशन दुकान से ही अनाज खरीद सकते हैं. बिहार के पुर्णिया ज़िले के कस्बा प्रखंड में भी एक असफल DBT योजना चला, पर इस प्रयोग की अन्य जानकारी नहीं है.

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पांच महीनों में राज्य में सात भूख से मौत के मामले आये

झारखंड में भूख और कुपोषण का स्तर देश में सबसे ज्यादा है और जन वितरण प्रणाली कई ग्रामीण परिवारों के लिए जीवनरेखा के सामान है. याद करें कि पिछले एक वर्ष में आधार से न जुड़े होने के कारण राज्य में लाखों राशन कार्ड रद्द कर दिये गये थे. पिछले पांच महीनों में राज्य में सात भूख से मौतों की सूचना मिली है. इनमें से पांच मौतें जन वितरण प्रणाली को आधार से जोड़ने के कारण हुई थी.

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DBT योजना को बंद करने की मांग को लेकर 26 फरवरी को नगड़ी से रांची तक पदयात्रा

DBT योजना को बंद करने की मांग उठाने के लिए 26 फरवरी को नगड़ी से रांची तक एक पदयात्रा होगी (पदयात्रा 10 बजे कठहल मोड़ से शुरू होगी). इसका आयोजन पांच विपक्षी दल (सीपीएम, झामुमो, कांग्रेस, भाकपा (माले) व झाविमो) व कई सामाजिक संगठनों (भोजन का अधिकार अभियान झारखंड, आदीवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच, ऑल इण्डिया पीपल्स फोरम झारखंड, युनाइटेड मिली फोरम, ऑल इण्डिया किसान सभा, झारखंड जन संस्कृति मंच, एकता परिषद, बगाइचा, झारखंड माग्रिक प्रयास मंच व अन्य) द्वारा संयुक्त रूप से हो रहा है.

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