खतरनाक गैस चैंबर की तरह बनती जा रही रांची, किसकी भूल से जहरीली हो रही है राजधानी की आबोहवा (सुनिये क्या कहते हैं भूवैज्ञानिक नीतीश प्रियदर्शी)

Publisher NEWSWING DatePublished Sat, 01/06/2018 - 20:25

Pravin Kumar/Subhash Shekhar

Ranchi: सरकार और प्रशासन समय रहते अलर्ट नहीं हुई तो आने वाले 10 सालों में रांची शहर की स्थिति बहुत ही भयावह हो जायेगी. राजधानी रांची की स्थिति झारखंड बनने के बाद बहुत तेजी के साथ बद से बदतर होती गई है. शहर को स्‍मार्ट करने के चक्‍कर में बिना सामंजस्‍य के और बिना योजना के अरबों रुपये पानी की तरह खर्च हो रहे हैं, लेकिन शहर का एक नाली भी ठीक नहीं हो सका है. इसकी वजह से रांची शहर दिल्‍ली एनसीआर की तरह प्रदूषण का गुब्‍बारा बनता जा रहा है.

विकास के लिए मनमाने तरीके से काम कर रहे ब्यूरोक्रेट्स

रांची के जाने-माने भू-वैज्ञानिक नीतीश प्रियदर्शी ने इन सब मामलों पर गहरी चिंता व्‍यक्‍त की है. उन्‍होंने न्‍यूज विंग के साथ अपने शोध और सर्वे की जानकारी साझा की और बताया कि रांची के डेवलपमेंट के लिए ब्‍यूरोक्रेट्स मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं. यहां पर किसी भी डेवलपमेंट स्किम पर काम करने के दौरान पर्यावरण और भूगर्भ के जानकार लोगों से सलाह नहीं ली जा रही है. जिसका साइड इफेक्‍ट भी आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा.

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रेनवाटर हार्वेस्टिंग पिट की अनिवार्यता पर सवाल

नी‍तीश प्रियदर्शी ने रांची नगर निगम के द्वारा सभी तरह के आवासों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग पिट की अनिवार्यता पर सवाल खड़ा किया है. उन्‍होंने कहा कि शहर में पहले से ही बिना प्‍लान के हजारों मकान बनाये गये हैं और अब जब रेनवाटर हार्वेस्टिंग पिट सभी के लिए अनिवार्य कर दिया गया तो तो अधिक होल्डिंग टैक्‍स से बचने के लिए लोग शौचालय के लिए बने सैप्टिक टैंक के पास ही बना दे रहे हैं. इससे सैप्टिक टैंक का दूषित पदार्थ पानी के साथ जमीन के अंदर जा रहा है. इसके कारण शहर का ग्राउंड लेबल वाटर तेजी से दूषित हो रहा है. शहर के कई हिस्‍सों में गर्मी के दिनों में पानी पीले रंग की बदबू के साथ आने लगा है. आगे चल कर हमें स्वच्छ सतही जल पीने को नहीं मिलेगा. परिस्थितियां दिनों-दिन विकराल होती जायेंगी.

सिस्टम में बैठे लोगों को करना चाहिये स्टडी

उन्‍होंने कहा कि सिस्‍टम पर बैठे लोगों को यह स्‍टडी करना होगा. यहां उस तरह का प्रोजेक्‍ट कितना सफल है. कहीं ऐसा न हो जाय कि लेने के देने पड़ जायें. लोग बना तो रहे हैं रेन वाटर हार्वेस्टिंग लेकिन उसका अगर टॉयलेट के सॉकपिट जैसा इस्‍तेमाल हो रहा है, तो कौन देखने जा रहा है. गंदा पानी निकासी के लिए अभी तक कोई मुक्‍कमल इंतजाम नहीं है, तो लोग ऐसा कर सकते हैं. यहां का सॉकपिट सैप्टिक टैंक भर जाता है, क्‍योंकि यहां की मिट्टी में सोखने की क्षमता भी नहीं है. मिट्टी की मोटाई 10 से 12 फीट होती है, उसकी सोखने की क्षमता बहुत कम होती है. इससे नाली का पानी भी घर के अंदर आने लगता है. इसके लिए नाली वैसा तैयार ही नहीं किया गया है जो सफल हो.

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आने वाले 5-10 साल में स्थिति और होगी विकराल

नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि सरकारी सिस्‍टम में फुल प्रूफ मैनेजमेंट प्‍लानिंग नहीं है. रांची की भौगोलिक संरचना उबड़-खाबड़ है. यहां एक नाली बनाने में भी छोटी मोटी बातों को नजरअंदाल कर दिया जाता है और काम पूरा करने की औपचारिका पूरी कर ली जाती है. जिससे नाली बनने का सही उद्देश्‍य पूरा नहीं हो पाता है. उन्‍होंने बताया कि रांची शहर दिल्‍ली एनसीआर की तरह गैस चैंबर की तरह हो रहा है. लोग सांस संबंधी बीमारी के शिकार हो रहे हैं. यह बहुत ज्‍यादा फैल रहा है. यह तो अभी शुरूआत है. आने वाले दिनों में यह और भी गंभीर हो जायेगी. आने वाले 5 से 10 सालों में स्थिति और विकराल हो जायेगी.

जमशेदपुर से क्यों नहीं सीखते लोग

नाली, पानी और कचरा यह तीन चीजें रांची शहर के लिए बेसिक जरूरते हैं. इसके इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को समय रहते सही तरीके से मैनेज नहीं किया गया तो शहर गैस चैंबर बन जायेगा. दिल्‍ली जैसे मैट्रो में ऐसा ही हो रहा है और आबोहवा दूषित हो गई है. जमशेदपुर में सब सही है. एयर पॉल्‍यूशन नियंत्रण में है. वहां से लोग क्‍यों नहीं सीखते हैं. रांची पर ही सभी तरह के प्रयोग क्‍यों हो रहे हैं.

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सैटेलाइट टाउनशिप के लिए सभी इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद

रांची में नया टाउनशिप बनाया जा सकता है. यहां पर सैटेलाइट टाउनशिप के लिए सभी तरह के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर मौजूद हैं. पिठोरिया, पतरातू, खूंटी जैसे जगह सभी रोड से कनेक्‍टेड हैं, इन्‍हें नये टाउनशिप के तौर पर डेवलप किया जा सकता है. इससे बहुत हद तक रांची शहर का लोड कम किया जा सकता है. इसपर सरकार का ध्‍यान नहीं है. सरकार के फैसले से पब्लिक परेशान है.

चट्टानों का अध्ययन किये बगैर बन रहे फ्लाइओवर

रांची शहर में फ्लाईओवर बनाया जा रहा है. क्‍या यहां की चट्टानें फ्लाईओवर के लोड को बर्दाश्‍त करने में सक्षम है. यहां की चट्टानें कहीं बहुत ज्‍यादा हार्ड हैं तो कहीं बहुत ही भुरभुरा है. रोड या फ्लाईओवर बनाने के पहले वहां पर जमीन के अंदर के चट्टानों का अध्‍ययन किया जाता है, ताकि जब गाड़ी चलेंगी, वाइब्रेशन होंगी तो पुल में दरार नहीं पड़े. यह सब सर्वे किया जाता है.

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